रांची, [विनोद श्रीवास्तव]। Jharkhand Election Results 2019 - लोकसभा चुनाव 2014 और 2019 में मतदाताओं की उपेक्षा के शिकार हुए झाविमो और राजद के समक्ष अस्तित्व का सवाल उठ खड़ा हुआ है। हालांकि मोदी लहर के बावजूद पिछले विधानसभा चुनाव में झाविमो के टिकट से आठ विधायक जीतकर आए थे, परंतु उनमें से छह भाजपा में शामिल हो गए। इससे इतर राजद का खाता न तो 2014 के लोकसभा चुनाव में खुला और न ही विधानसभा चुनाव में।
दोनों ही दलों को अब अक्टूबर-नवंबर में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव में संभलने का एक और मौका मिलेगा। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि अगर वे यहां भी फेल होते हैं तो दोनों ही दलों का नाम इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा। मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद 2006 में झाविमो का गठन करने वाले बाबूलाल मरांडी ने पिछले 12-13 वर्षों के कालखंड में कई उतार-चढ़ाव देखे। जब उन्होंने भाजपा से अलग होकर नई पार्टी बनाई थी, उन्हें कई दिग्गजों का साथ मिला था।
यह उनकी मेहनत और पार्टी की सांगठनिक मजबूती ही थी कि नई पार्टी होते हुए 2009 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने 11 सीटें झटक ली। और तो और 2014 की मोदी लहर में भी झाविमो के टिकट से जीतकर आठ विधायक आए, परंतु राजनीतिक महत्वाकांक्षा में उनके छह विधायकों ने दल बदल लिया। उनमें से दो आज जहां रघुवर कैबिनेट में मंत्री हैं, वहीं तीन विभिन्न बोर्ड-निगमों के अध्यक्ष।
2014 के लोकसभा चुनाव से सबक लेते हुए बाबूलाल ने 2019 का लोकसभा चुनाव महागठबंधन के प्रत्याशी के तौर पर कोडरमा से लड़ा, लेकिन लगभग दो महीने पूर्व प्रदेश राजद अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थामने वाली अन्नपूर्णा देवी से वे बुरी तरह से पराजित हो गए। कुछ ऐसा ही हाल झाविमो के प्रधान महासचिव प्रदीप यादव का गोड्डा लोकसभा क्षेत्र में हुआ। वे भाजपा प्रत्याशी निशिकांत दुबे के हाथों 2014 में भी पराजित हुए थे, इस बार भी वे उन्हें मात नहीं दे सके।
झारखंड में राजद का इतिहास भी झाविमो से कुछ हद तक मिलता-जुलता है। झारखंड गठन के बाद से ही प्रदेश में राजद की सक्रियता का ग्राफ गिरने का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसकी भरपाई आज तक नहीं हो सकी है। अविभाजित बिहार में झारखंड से राजद के नौ विधायक हुआ करते थे। 2005 में यह संख्या घटकर सात हो गई और 2009 में पांच रह गई। 2014 में इनका सुपड़ा ही साफ हो गया।
दरअसल, अविभाजित बिहार में गाहे-बगाहे राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव यहां की भी टोह ले लिया करते थे। इससे इतर राज्य गठन के बाद उन्होंने इसकी कमान प्रदेश के नेताओं के हवाले कर दिया, जिसने दल के सांगठनिक मजबूती पर खास फोकस नहीं किया। नतीजतन प्रदेश राजद का कुनबा धीरे-धीरे बिखरता गया।
हार हुई है, आस नहीं टूटी
लोकसभा चुनाव में शिकस्त खाने के बाद थोड़ी निराशा जरूर हुई, परंतु भविष्य की राजनीति को लेकर झाविमो और राजद दोनों ही दलों में आस बरकरार है। झाविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी के अनुसार, इस चुनाव में जो जनादेश आया, इसकी कतई उम्मीद नहीं थी। इस चुनाव ने संकेत में ही सही, यह भी कह डाला कि मोदी मैजिक आज भी कहीं न कहीं प्रभावी है। हालांकि यह चुनाव लोकसभा का था। इसे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। लोस चुनाव में हार-जीत बहुत हद तक प्रधानमंत्री का चेहरा और राष्ट्रीय एजेंडे पर निर्भर करता है।
इससे इतर विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दे हावी होते हैं। आने वाले विधानसभा चुनाव में हमारी दमदार वापसी होगी। इधर, प्रदेश राजद अध्यक्ष गौतम सागर राणा भी बाबूलाल मरांडी की बातों से बहुत हद तक इत्तेफाक रखते हैं। वे कहते हैं, हार की समीक्षा हो रही है। जहां-जहां चूक हुई है, उसमें सुधार लाकर नए उत्साह से हम मतदाताओं के बीच जाएंगे। राजनीति में हार-जीत लगा रहता है। हमारी आस नहीं टूटी है।

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Posted By: Sujeet Kumar Suman