रांची, प्रदीप शुक्ला। राज्य में तेजी से दोबारा फैल रहे कोरोना संक्रमण के बीच अब वैक्सीन की उपलब्धता को लेकर राजनीति शुरू हो गई है। झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता ने तो बाकायदा वैक्सीन की कमी का रोना रोते हुए केंद्र पर उपेक्षा का आरोप भी जड़ दिया है, वहीं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी कहा है कि वह इस बाबत जल्द ही केंद्र को पत्र लिखेंगे। हांलाकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन यह कह रहे हैं कि राज्य को जरूरत के मुताबिक वैक्सीन उपलब्ध करवाई जा रही है और संकट जैसी कोई बात नहीं है, लेकिन यह कड़वा सच है कि वैक्सीन के अभाव में तमाम केंद्रों पर दो दिनों से पूरी क्षमता से टीकाकरण नहीं हो पा रहा है। कहीं कोवैक्सीन की डोज कम पड़ रही है तो कहीं कोविशील्ड की।

पिछले एक सप्ताह में वैक्सीन लेने को लेकर लोगों में जो उत्साह बना है, उससे मांग और आपूíत का अंतर साफ दिख रहा है। इससे यह तो जाहिर हो ही रहा है कि कुछ न कुछ समस्या है। वैक्सीन की आस लगाए लोगों में यह आशंका भी पनपने लगी है कि आने वाले दिनों में भी उन्हें टीकाकरण कराने के लिए जद्दोजहद का सामना करना पड़ सकता है।

पिछले तीन दिनों से वैक्सीन संकट के बीच गुरुवार सुबह कोवैक्सीन की दो लाख डोज पहुंची है। इससे राज्य सरकार ने थोड़ी राहत की सांस ली है। कोवैक्सीन की कमी से कई दिनों से कोवैक्सीन का टीकाकरण ठप था। कुछ डोज थी उसे दूसरी डोज लेने वालों के लिए सुरक्षित कर लिया गया था। केंद्र सरकार से चल रहे संवाद के मुताबिक शुक्रवार को कोविशील्ड की भी 10 लाख डोज और पहुंच जाएंगी। फिलहाल राज्य के लिए 20 लाख डोज स्वीकृत हुई है। उम्मीद है कि आगे राज्य और केंद्र में वैक्सीन की उपलब्धता को लेकर बेहतर समन्वय बना रहेगा, लेकिन जो मौजूदा हालात हैं उसमें इसकी संभावना उतनी दिख नहीं रही है।

राज्य के स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता कह रहे हैं कि इस आदिवासी और पिछड़े राज्य के प्रति केंद्र को और दरियादिली दिखानी चाहिए। पिछले कुछ दिनों से सप्लाई में बाधा आई है, जबकि लोगों में टीकाकरण के प्रति रुझान बढ़ा है। इस समय राज्य में विशेष अभियान भी चल रहा है जिसमें प्रतिदिन डेढ़ लाख लोगों को वैक्सीन देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। वैक्सीन की कमी के चलते यह भी प्रभावित हो रहा है। हालांकि राज्य के स्वास्थ्य सचिव का कहना है कि वैक्सीन की कोई कमी नहीं है। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि कहीं वैक्सीन को लेकर राजनीति तो नहीं हो रही है?

यह सच भी किसी से छुपा नहीं है कि स्वास्थ्य ढांचे में अभी भी अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है। राज्य में 10 हजार पर सिर्फ दो ही चिकित्सक हैं। स्वास्थ्य कíमयों, स्वास्थ्य केंद्रों पर चिकित्सीय उपकरणों सहित अन्य तमाम संसाधनों का घोर अभाव है। इससे कोरोना के गंभीर मरीजों का उपचार करने वाले राज्य के गिने-चुने अस्पतालों पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। कोरोना टीकाकरण की रफ्तार भी कई अन्य राज्यों की तुलना में धीमी है। अब यह जगजाहिर हो चुका है कि कोविड महामारी से बचाव दो ही तरीकों से हो सकता है। पहला, संक्रमण से बचने के लिए जारी दिशा-निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करवाया जाए। दूसरा, ज्यादा से ज्यादा आबादी को वैक्सीन का सुरक्षा चक्र मुहैया करवाया जाए। मौजूदा हालात में अगर राज्य की 70 फीसद आबादी को तीन महीने में कोरोना से प्रतिरक्षित करना है तो रोज 2.77 लाख लोगों का टीकाकरण करना होगा। राज्य की वर्तमान अनुमानित आबादी 3.77 करोड़ है। यदि इनमें से 70 फीसद आबादी के टीकाकरण का लक्ष्य रखें तो लगभग 2.64 करोड़ लोगों का टीकाकरण करना होगा। इनमें से 14.42 लाख को पहली डोज लग चुकी है। शेष लगभग 2.49 करोड़ आबादी को पहली डोज के टीके का लक्ष्य अगले तीन माह में पूरा करने के लिए प्रतिदिन लगभग 2.77 लाख लोगों को टीका लगाना होगा।

राज्य में 45 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी लगभग 83 लाख है। इनमें लगभग 12 लाख को पहली डोज का टीका लग चुका है। शेष 71 लाख की आबादी के टीकाकरण का लक्ष्य एक माह में पूरा करना है तो प्रतिदिन लगभग 2.36 लाख लोगों को टीका लगाना होगा। टीकाकरण की क्षमता की बात करें तो वर्तमान में प्रतिदिन लगभग डेढ़ लाख लोगों को टीका देने की क्षमता है। विशेष अभियान के तहत एक दिन में 1.40 लाख लोगों को टीका लगाया भी जा चुका है। अगर राज्य में तीन से चार माह में 70 फीसद आबादी को प्रतिरक्षित करना है तो प्रतिदिन अभियान मोड में टीकाकरण का कार्य करना होगा।

राज्य में बड़ी समस्या लक्ष्य के अनुरूप टीकाकरण नहीं होना है। सामान्य दिनों में प्रतिदिन लगभग 48 हजार टीकाकरण का लक्ष्य रखा जाता है, जबकि लक्ष्य के अनुरूप 40 से 45 फीसद लोगों को ही टीका लग पाता है। विशेष अभियान में ही 80 फीसद से अधिक लक्ष्य पूरा होता है। एक बड़ी समस्या पहली डोज लेने के बाद दूसरी डोज लेने में सुस्ती भी है। स्थिति यह है कि प्रतिदिन लक्ष्य के अनुरूप तीन से चार फीसद ही दूसरी डोज का टीकाकरण हो पाता है। पहली डोज लेनेवाले लोगों में अभी तक 70 फीसद ने ही समय पर दूसरी डोज का टीका लिया है, जबकि कोरोना से प्रतिरक्षण के लिए दूसरी डोज का टीका लेना अनिवार्य है।

[स्थानीय संपादक, झारखंड]

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