रांची, प्रदीप सिंह। Power Crisis in India मांग के मुताबिक कोयले की उपलब्धता में कमी देशभर में महसूस की जा रही है। इसका असर बिजली उत्पादक संयंत्रों पर पड़ा है। हालांकि स्थिति को सामान्य बनाने की भरसक कोशिश भी चल रही है, लेकिन इस तात्कालिक किल्लत की कई वजहों में से एक बड़ा कारण ऐसा भी है, जिस पर ज्यादा चर्चा नहीं होती। वह कारण कोयला उत्पादक क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर आने वाली बाधा और राजनीति है। उल्लेखनीय है कि झारखंड में देश का लगभग 40 प्रतिशत कोयला भंडार है और यहां के कोयला उत्पादन पर इन बाधाओं का खूब असर पड़ता है। इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि यहां की विभिन्न कोल साइडिंग से रोजाना दो दर्जन से ज्यादा रैक कोयला की आपूर्ति बाधित होती है।

समझा जा सकता है कि यह किल्लत कृत्रिम है या स्वाभाविक। निश्चित तौर पर कोयले की ढुलाई में आने वाली तमाम बाधाओं को समाप्त कर स्थिति को सामान्य बनाया जा सकता है। कोयले की कमी के बाद इस ओर ध्यान भी गया है, लेकिन यह भी देखना होगा कि इसके पीछे का आर्थिक तंत्र क्या है। दरअसल झारखंड के कोयला खनन क्षेत्रों में बेवजह की दखलंदाजी बहुत ज्यादा है। दबंग नेताओं की दिलचस्पी, कोयला ढुलाई में स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक अधिकारियों का हस्तक्षेप और स्थानीयता के नाम पर विवाद इसे पेचीदा बनाता है। कोयले की काली कमाई पर वर्चस्व के लिए अक्सर धरती लाल होती है। पहले यह धनबाद और उसके आसपास के इलाकों तक सीमित था, लेकिन खनन के नए क्षेत्रों के विकसित होने के बाद इसका विस्तार हो रहा है।

मगध और आम्रपाली कोल ब्लाक का क्षेत्र इसका उदाहरण है। यहां कोयले असर खनन और ढुलाई पर पड़ता है। कई बार पथराव से लेकर पुलिस फायरिंग तक की नौबत आई है। सुलह के बाद कुछ दिनों तक स्थिति सामान्य रहती है, लेकिन धीरे-धीरे फिर से परेशानी खड़ी हो जाती है। इसका स्थायी निदान खोजना आवश्यक है, क्योंकि विद्युत उत्पादक संयंत्रों को मांग के मुताबिक ईंधन की आपूर्ति नहीं होने का विपरीत असर बिजली आपूर्ति पर पड़ेगा और बिजली मांग के अनुरूप नहीं मिली तो देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। राज्य सरकार के साथ मिलकर केंद्र इसका स्थानी समाधान निकालने की पहल करे तो स्थिति सामान्य होते देर नहीं लगेगी।

सबको साधने की कोशिश : लंबी कवायद के बाद झारखंड में सत्तारूढ़ गठबंधन बीस सूत्री कमेटियों में अपनी-अपनी हिस्सेदारी को लेकर नतीजे पर पहुंच गया है। ये कमेटियां राज्य स्तर से लेकर जिला और प्रखंड स्तर पर गठित होंगी। इनका काम विकास योजनाओं की देखरेख और उसका निर्धारण है। सत्तारूढ़ गठबंधन के तीनों घटक दलों झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और राजद में पदों का बंटवारा होगा। सबसे बड़ा दल होने के नाते झारखंड मुक्ति मोर्चा के खाते में 55 प्रतिशत पद आएंगे, जबकि 40 प्रतिशत पद कांग्रेसियों को मिलेंगे। सबसे कम हिस्सेदारी महज पांच प्रतिशत राष्ट्रीय जनता दल को मिलेगी, क्योंकि विधानसभा में राजद का महज एक विधायक है। लंबी मशक्कत के बाद सत्तारूढ़ गठबंधन सीटों की हिस्सेदारी तय कर पाया है, हालांकि इसे लेकर सबसे अधिक दबाव कांग्रेस की ओर से बनाया गया। इस साल के आरंभ में ही कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी आरपीएन सिंह ने इस संबंध में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के साथ बैठक कर इसकी आवश्यकता बताई थी। कमेटियों के गठन से निचले स्तर तक के कार्यकर्ताओं को सत्ता में भागदारी का अहसास होगा। एक अनुमान के मुताबिक तीनों दलों के ढाई हजार कार्यकर्ताओं को पद मिलेगा। इससे सत्तारूढ़ गठबंधन के तीनों दलों के कार्यकर्ताओं में नए सिरे से जोश भरा जा सकेगा।

इस संबंध में एक बड़ी चुनौती भाजपा सरीखे विरोधी दल से भिड़ना भी है, हालांकि इस मोर्चे पर सत्तारूढ़ गठबंधन फिलहाल फायदे में ही है। सरकार गठित होने के बाद तीन विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में सत्तारूढ़ गठबंधन ने ही बाजी मारी है। अगले साल राज्यसभा का द्विवार्षिक चुनाव प्रस्तावित है और झारखंड की दो सीटें खाली हो रही हैं। दोनों सीटें भाजपा के कब्जे में है, लेकिन विधायकों की संख्या को देखते हुए एक सीट पर सत्तारूढ़ गठबंधन का काबिज होना तय है। इसके लिए आवश्यक है कि गठबंधन के दलों के भीतर आपसी तारतम्य व समन्वय बना रहे और कार्यकर्ताओं का जोश भी बरकरार रहे। आगे आने वाले दिनों में चुनौती और बढ़ेगी, क्योंकि विभिन्न राजनीतिक मुद्दों को लेकर भाजपा हमलावर होने की तैयारी में है।

Edited By: Sanjay Pokhriyal