जासं, रांची : कोरोना संकट के कारण स्कूल बंद हुए तो बच्चों ने आनलाइन पढ़ाई की राह पकड़ी। यह बच्चों के लिए अलग अनुभव वाली चीज रही। अलग-अलग एप पर वीडियो चैटिंग या वीडियो कांफ्रेंसिंग कर बच्चों ने पूरे सेशन की पढ़ाई की। लेकिन इसका नकारात्मक प्रभाव भी पड़ा है। आनलाइन क्लास करने से बच्चों की सेहत पर असर पड़ा है। खासकर बच्चों की आंखें खराब हो रहीं हैं। बच्चे लगातार मोबाइल, टैब, लैपटाप और दूसरे इलेक्ट्रानिक गैजेट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। नतीजा बच्चों की आंखों की रोशनी कम होती जा रही है।

राज्य के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स के नेत्र ओपीडी में पिछले पांच महीने में 4500 से अधिक बच्चे इलाज कराने पहुंचे। इसमें 2000 से अधिक को चश्मा लगाने की नौबत आ गई। रिम्स के नेत्र रोग विशेषज्ञ डा. राहुल प्रसाद ने कहा कि कोरोना के कारण स्कूलें बंद हो गईं, जिसके बाद सब आनलाइन हो गया। अचानक बच्चों का स्क्रीन टाइम बढ़ गया। इससे उनकीआंखों पर जोर पड़ा। नतीजा आंखों से पानी आना, आंखों में सूखापन आदि लक्षण दिखने लगे। डा. राहुल प्रसाद ने आंकड़ों का उदाहरण देते हुए बताया कि कोरोना से पहले जहां 100 मरीजों में एक सा दो में इस तरह की परेशानी देखने को मिलती थी, लेकिन अब संख्या बढ़कर 10 से 15 हो चुकी है।

रिम्स के ओपीडी आंकड़ों के अनुसार कोरोना के बाद आंखों से संबंधित बीमारी के कारण 8000 लोग इलाज कराने पहुंचे। कुल संख्या में आधे से अधिक 4500 स्कूली बच्चे थे। डा. राहुल ने बताया कि बच्चों को अब स्क्रीन टाइम कम करने की जरूरत है। इसके लिए चिकित्सक परिजनों को भी परामर्श भी दे रहे है।

हर 20 मिनट में 20 सेकेंड का लें ब्रेक

नेत्र रोग विशेषज्ञ डा. अभिषेक रंजन ने कहा कि आनलाइन पढ़ाई के कारण सबसे अधिक 7 से 15 साल तक के बच्चे परेशान हैं। निजी क्लीनिक में भी इनकी संख्या बढ़ी है। इन्हें इलाज के साथ हर 20 मिनट में अपनी आंख को ब्रेक देने की सलाह दी जा रही है। डा. अभिषेक ने बताया कि लगातार स्क्रीन में नजर डालकर रखने से आंखों की रोशनी कम होने लगती है। इसलिए नजर को थोड़े-थोड़े देर में भटकाने की जरूरत है। आंखें सूखने की स्थिति में पानी से धोना चाहिए। पानी आने की स्थिति में चिकित्सक से परामर्श लेने के बाद आइ ड्रॉप या एआरसी कोटेड चश्मा का इस्तेमाल करना चाहिए।

बढ़ रही आंखों में ड्राइनेस की समस्या, ब्लींकिंग रेट में भी कमी

डा. अभिषेक रंजन बताते है कि मोबाइल, लैपटाप, एवं अन्य एलईडी स्क्रीन पर बने रहने से आंखों में ड्राइनेस की समस्या बढ़ रही है। बच्चों में ब्लींकिंग रेट की कमी मिल रही है। यह समस्या नए उम्र के युवाओं के साथ विभिन्न विभागों में काम करने वाले लोगों में बढ़ने लगी है। यदि आंखों का ब्लींकिंग सामान्य नहीं रहा तो इसका प्रभाव ब्रेन पर भी पड़ने की संभावना बढ़ जाती है। आंखों के साथ कानों पर भी बुरा असर डाल रहा है। बच्चों को ये है सलाह

जरूरत पड़ने पर चश्मा लगाएं।

स्क्रीन टाइम कम करें।

स्क्रीन का इस्तेमाल करते वक्त उससे जितना दूर हो सके, बैठें।

अधिक समस्या हो तो एआरसी कोटेड ग्लास का इस्तेमाल करें।

कमरे में लाइट की पर्याप्त व्यवस्था सुनिश्चित करें।

यदि आनलाइन स्टडी चल रही है तो हर 20 मिनट के बाद कुछ सेकेंड के लिए आखों को आराम दें।

डाक्टर के बताए अनुसार आखों को घुमाने आदि जैसी एक्सरसाइज करते रहें।

स्क्रीन का इस्तेमाल करते समय पलकें झपकाना ना भूलें आई ओपीडी में मरीजों की संख्या

माह - संख्या

जनवरी - 2135

फरवरी - 2242

मार्च - 1162

अप्रैल - 1 (ओपीडी बंद)

मई - 1 (ओपीडी बंद)

जून - 352

जुलाई - 360

अगस्त - 218

सितंबर - 598

अक्टूबर - 2238

नवंबर - 1190

दिसंबर - 2158 क्या कहते हैं स्कूलों के प्राचार्य

यह सही है कि आनलाइन पढ़ाई के कारण बच्चों का स्क्रीन टाइम अधिक हो गया है। हालांकि बच्चों की आंखों पर अधिक असर न हो इसके लिए एक से दूसरे आनलाइन क्लास के बीच ब्रेक दिया जाता है। हालांकि लैपटाप या बड़े स्क्रीन वाले टैब का इस्ेतमाल कर आंखों की परेशानी से बचा जा सकता है। आंखें ही नहीं, कई परेशानी बढ़ी

बच्चों के स्वभाव में आ रहा अंतर

लगातार घर में रहने से बच्चों का स्वभाव बदल गया है। अभिभावकों का कहना है कि बच्चे चिड़चिड़े हो गए हैं। बात-बात पर तुनक जाते हैं। अकड़ रही गर्दन

बच्चों की शिकायत रह रही है कि उनकी गर्दन अकड़ गई है। मांसपेशियों में दर्द रहता है। यही नहीं, उनकी उंगलियों में भी एेंठन रह रही है। मोटापे के हो रहे शिकार

फिजिकल एक्टिविटी बढ़ने से बच्चों में मोटापा बढ़ा है। रांची के कोकर की रहनेवाली किरण देवी बताती हैं कि उनके बच्चे का वजन 8 से 10 किलो बढ़ गया है। बच्चे की फिजिकल एक्टिविटी नहीं होने से वे परेशान हैं। ऐसी ही परेशानी दूसरे अभिभावकों की भी है। बच्चे भी तनाव के हो रहे शिकार

यही नहीं बच्चों के मस्तिष्क पर भी असर पड़ रहा है। बच्चे तनाव के शिकार हो रहे हैं। कुछ बच्चों में तो डिप्रेशन भी देखने को मिला है। नाखून चबाना, अंगूठा दबाना, बाल खींचना जैसे लक्षण बच्चों में साफ देखे जा सकते हैं।

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