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रांची में कहीं 1883 की परंपरा, तो कहीं चट्टान काटकर बने मंदिर में 1826 से पूजी जा रही हैं मां दुर्गा

Published: Fri, 16 Oct 2026 08:51 AM (IST)

राजधानी रांची में दुर्गा पूजा केवल भव्य पंडालों तक सीमित नहीं है, बल्कि कई प्राचीन पूजा स्थलों पर सदियों पुरानी परंपराओं के अनुसार मनाई जाती है।

रांची में दुर्गा पूजा

रांची में दुर्गा पूजा

HighLights

  1. रांची में प्राचीन मंदिरों में सदियों पुरानी दुर्गा पूजा परंपराएं।

  2. मुकुंद दानी मंदिर में 1826 से चट्टान काटकर पूजा।

  3. दुर्गाबाड़ी में 1883 से एकचाला प्रतिमा की 144वीं पूजा।

जागरण संवाददाता, रांची। राजधानी रांची में दुर्गा पूजा केवल भव्य पंडालों और आकर्षक सजावट तक सीमित नहीं है। शहर के कई प्राचीन पूजा स्थलों पर वर्षों से चली आ रही परंपराओं के अनुसार मां दुर्गा की आराधना की जाती है। 

कहीं एकचाला प्रतिमा में मां अपने परिवार के साथ विराजमान होती हैं, तो कहीं चट्टान काटकर बनाए गए प्राचीन मंदिर में पूजा होती है। देशप्रिय क्लब, हरिमति मंदिर, दुर्गाबाड़ी और मुकुंद दानी मंदिर में इस वर्ष भी परंपरा, भक्ति और धार्मिक विधि-विधान के साथ दुर्गोत्सव मनाया जा रहा है।

देशप्रिय क्लब में 65 वर्षों से मां की आराधना, होगी शंख ध्वनि प्रतियोगिता

देशप्रिय क्लब एंड लाइब्रेरी में पिछले 65 वर्षों से मां दुर्गा की पूजा पारंपरिक और शास्त्रीय विधि-विधान से होती आ रही है। इस वर्ष मूर्तिकार जगदीश पाल शुभ्र आभा वाली मां दुर्गा की प्रतिमा तैयार कर रहे हैं। 16 अक्टूबर को षष्ठी के दिन बोधन के साथ पूजा शुरू होगी। 

गुरुवार से पंचमी से सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू होगा। पहले दिन शाम 7:30 बजे आगोमनि और मातृ वंदना की प्रस्तुति होगी। इसके बाद नवमी तक नृत्य-संगीत, रंगोली, धुनुची नृत्य, शंख ध्वनि और उलू ध्वनि प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी। पूजा समिति के अध्यक्ष डॉ. कमल कुमार बोस और सचिव प्रणब कुमार चौधरी हैं।

हरिमति मंदिर में 91 वर्षों से बंगाली परंपरा, हर दिन लगेंगे भोग

लालपुर स्थित सर्कुलर रोड के हरिमति मंदिर परिसर में 91 वर्षों से बंगाली विधि-विधान के अनुसार मां दुर्गा की पूजा की जा रही है। इस बार बांस, कपड़े, बीट और टोकरी की मदद से पूजा पंडाल तैयार किया जा रहा है। पूजा पर करीब 30 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान है। 

यहां एकचाला प्रतिमा में मां दुर्गा के साथ सरस्वती, लक्ष्मी, गणेश और कार्तिकेय विराजमान होंगे। सप्तमी, अष्टमी और नवमी पर भंडारा और भोग वितरण किया जाएगा। महा सप्तमी के दिन टैलेंट शो, शंख ध्वनि प्रतियोगिता और ओपन माइक शो का आयोजन भी होगा।

दुर्गाबाड़ी में 144वीं पूजा, एकचाला प्रतिमा की परंपरा कायम

दुर्गाबाड़ी में वर्ष 1883 से मां दुर्गा की पूजा होती आ रही है। इस वर्ष यहां 144वीं दुर्गा पूजा आयोजित की जा रही है। करीब डेढ़ एकड़ में फैले परिसर में कंक्रीट का मंदिर है। यहां अलग से पंडाल नहीं बनाया जाता है। 

दुर्गाबाड़ी की खास पहचान एकचाला प्रतिमा है, जिसमें मां दुर्गा सहित पांचों देवी-देवताओं की प्रतिमाएं एक ही संरचना में स्थापित होती हैं। वर्षों से प्रतिमा के आकार और वेशभूषा की परंपरा बरकरार है। पूजा का कोई निर्धारित बजट नहीं है। 

श्रद्धालुओं के स्वैच्छिक दान से आवश्यक खर्च पूरे किए जाते हैं। यहां भंडारा नहीं होता और चावल का भोग भी नहीं चढ़ाया जाता है। सभी रस्में बांग्ला पंचांग के अनुसार संपन्न होती हैं। महानवमी पर ढाकी प्रतियोगिता होती है, जिसमें विभिन्न पूजा समितियों के ढाकी भाग लेते हैं। बेहतर प्रदर्शन करने वालों को पुरस्कृत किया जाता है।

पत्थर से काटकर बनाया मंदिर, 1826 से हो रही पूजा

डेली मार्केट परिसर स्थित मुकुंद दानी मंदिर में वर्ष 1826 से मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की जा रही है। मंदिर की विशेषता यह है कि इसका निर्माण चट्टान को काटकर किया गया है। इसमें सीमेंट, लोहे, गिट्टी और बालू के बजाय चूना, सुर्खी और तराशे गए पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। इस वर्ष पूजा की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। 

यहां वैष्णवी समाज के लोग पूजा करते आ रहे हैं। समिति के आशीष तिवारी के अनुसार, सप्तमी पर बुंदिया, अष्टमी पर हनुवा, पूरी और चना, नवमी पर खिचड़ी तथा दशमी पर खीर का भोग अर्पित किया जाएगा। आयोजन में आशीष तिवारी, सन्नी साहू, चंदन कुमार, नमन कुमार, विश्वरूप देव और सुजेल पाल सहित अन्य सदस्य जुटे हैं।

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