रांची, [संजय कुमार]। कोरोना वायरस को लेकर लगाई गई लॉकडाउन ने किसानों की कमर तोड़ दी है। उन्हें न तो बाजार मिल रहा है और न ही फसल का उचित दाम। उपज को पास की मंडियों तक ले जाने वाली लागत तक उसे बेचकर नहीं निकल पा रही है। ऐसे में हजारों किसानों ने खेतों में ही उपज को सडऩे के लिए छोड़ दिया है। हताशा के इस दौर से किसानों का हमदर्द बनकर सामने आया है अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप)। परिषद के सदस्यों ने प्रथम चरण में खूंटी के किसानों पर फोकस किया है।

कई हेक्टेयर में लगे तरबूज वे न सिर्फ खरीद रहे हैं, बल्कि उसे जमशेदपुर, बोकारो, हजारीबाग के अलावा पड़ोसी राज्यों तक भेजने में किसानों की मदद कर रहे हैं। बदले में सिर्फ संबंधित मंडियों तक तरबूज ले जाने में आने वाली लागत वसूल रहे हैं। शेष पैसा किसानों को मुहैया करा रहे हैं। अबतक 700 टन तरबूज खरीद कर विभिन्न मंडियों में पहुंचा चुके हैं। इसके साथ ही 2.50 लाख लीची भी बाजार तक पहुंचाने का काम कर चुके हैं। इससे किसानों में उम्मीद की किरण जागी है।

लॉकडाउन के समय किसानों की समस्या सामने आने के बाद अभाविप के क्षेत्र संगठन मंत्री निखिल रंजन, प्रदेश संगठन मंत्री याज्ञवल्य्क शुक्ल ने अपने साथियों के साथ मिलकर विचार करना शुरू किया कि क्या किया जाए। फिर तय हुआ कि खूंटी निवासी और रांची विश्वविद्यालय छात्र संघ के डिप्टी सेक्रेटरी सौरभ कुमार साहू के नेतृत्व में किसानों से तरबूज खरीद कर उसे उचित मूल्य दिलाने का काम किया जाएगा।

फिर क्या था लॉकडाउन के समय लोग जहां घरों में बंद थे वहीं सौरभ अभाविप के कार्यकर्ताओं के साथ गांवों में किसानों के बीच रहने लगा। वहां से तरबूज खरीद कर शहरों में पहुंचाने लगा। इससे स्थानीय बिचौलिए की मनमानी बंद हो गई। सौरभ ने कहा कि संकट के इस समय संगठन के लोग अलग-अलग रूप में लोगों की मदद कर रहे हैं। किसानों की मदद करके हमलोगों को बहुत ही ज्यादा संतुष्टि मिल रही है। इस प्रयोग को आगे भी जारी रखने पर विचार किया जा रहा है ताकि कोई बिचौलिए मनमाने दाम पर किसानों से कोई भी सामान नहीं खरीद सके। इस काम में मुकंदर साहू, जितेंद्र कुमार, निलिमा,  श्वेता लकड़ा आदि का अहम योगदान रहा।

स्थानीय व्यापारियों से ज्यादा दाम दिए

खूंटी के किसान विवेक महतो ने बातचीत में कहा कि अभाविप के सौरभ साहू एवं उनके साथियों के प्रयास से स्थानीय व्यापारी मनमाने दाम पर तरबूज नहीं खरीद सके। कुंदारी गांव के आसपास 150 एकड़ से अधिक जमीन पर तरबूज की खेती की गई है। यहां के किसानों को उचित मूल्य मिला। जिन इलाकों में अभाविप के लोग नहीं पहुंच सके वहां के स्थानीय व्यापारी मनमाने ढ़ंग से तरबूज खरीदने में सफल रहे।

Posted By: Alok Shahi

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