रांची, जागरण स्‍पेशल। झारखंड लोक सेवा आयोग ने सातवीं सिविल सेवा परीक्षा की अधिसूचना को रद कर दिया है। सरकार के स्‍तर पर कार्मिक विभाग ने आरक्षण संबंधी विसंगतियां दूर करने के नाम पर अपनी अनुशंसा वापस ले ली है। हालांकि सातवीं जेपीएससी में तीन बार के पेंडिंग पदों पर परीक्षा की तैयारी थी, लेकिन आगे चलकर कोर्ट-कचहरी में मामला फंसने के पूरे आसार थे। वैसे भी जेपीएससी के अब तक के रिकॉर्ड को देखें तो यहां परीक्षा से पहले ही मुकदमे की तैयारी हो जाती है। इधर मंगलवार को झारखंड विधानसभा में पेश हो रहे बजट को लेकर वित्‍त मंत्री को खाली खजाने का चौकीदार बताया जा रहा है। वे अब तक कई दफा खाली खजाना का रोना रो चुके हैं। ऐसे में कोई भी मंत्री अपने विभाग के लिए खास प्रावधान के बारे में उनसे पैरवी करने नहीं पहुंच रहा। यहां पढ़ें राज्‍य ब्‍यूरो के विशेष संवाददाता आशीष झा के साथ कही अनकही...

नौकरी का सातवां फेरा

झारखंड लोक सेवा आयोग के लिए संभलने का वक्त आ गया है और संभलकर रहे तो मुसीबतें कम आएंगी। सातवीं जेपीएससी के पूर्व के सभी जेपीएससी से संबंधित मामले कोर्ट में जाते रहे हैं और एक बार फिर इस बात की आशंका प्रबल है लेकिन सरकार पहले ही संभल गई है। थोड़ी सी भी असावधानी एक बार फिर परीक्षा को फेरे में डाल सकती है। शायद यही कारण है कि सरकार ने पहले ही संभलते हुए हाईपावर कमेटी बना ली है। अब कमेटी निश्चित तौर पर कोई ऐसा रास्ता निकालेगी जिससे मुसीबतें कम हों। एक बात पहले से ही तय मानिए कि परीक्षा शुरू होने से लेकर अंत तक मुकदमे होंगे और ऐसी तैयारी कम से कम उन लोगों ने तो कर ही ली है जिन्होंने परीक्षा को लेकर अब तक के मुकदमों में महती भूमिका निभाई है। सो, सरकार के लिए यह परीक्षा चुनौती है।

खाली खजाने का चौकीदार

वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव इतनी बार खाली खजाना-खाली खजाना बोल चुके हैं कि आसपास के इलाकों से डिमांड ही खत्म होते जा रही है। उनके अगल-बगल के मंत्रियों के पास तो कल्याण से लेकर ग्रामीण विकास तक है लेकिन फिलहाल किसी को कुछ नहीं चाहिए। उनके इर्द-गिर्द नेताओं की भरमार लेकिन कोई एक ढेला तक मांगने नहीं आया। मतलब यह कि अब वो दिन बीत गए जब खजाने के चौकीदार के इर्दगिर्द भीड़ होती थी। इधर तो कोई उनके कमरे में झांकने नहीं जा रहा। अब भैया गरीबी का इतना ढिंढोरा पीट चुके हैं कि कोई किस मुंह से पैसा मांगने जाए। लोग तो इन्हें खाली खजाने का चौकीदार बताने से गुरेज नहीं कर रहे। उनकी पार्टी वाले उम्मीद कर रहे हैं कि अब बिना मांगे ही सबकुछ मिल जाएगा। वो कहते हैं ना - बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले न भी भीख।

बड़े लाजवाब, छोटे नवाब

छोटे अंसारी जुबान से भले ही बुरे हों, लेकिन दिल से हीरा हैं ... हीरा। किसी जौहरी से पूछ लो या खुद ही आजमा कर देख लो। कुछ ही दिनों पहले की बात है जब छोटे नवाब अपने दुश्मनों के पार्टी में शामिल होने की सूचना पर चिल्लाने लगे थे लेकिन अब उसे ही गले लगाने को तैयार हैं। इसके लिए जिगर नहीं जिगरा चाहिए। सभी बातें भूलकर छोटे नवाब तो अब प्रदीप-बंधु के साथ हैं। यह हुई ना जिगर वाली बात। अब 56 और 58 इंच के विवाद में हम तो नहीं पडऩे वाले। हमारा साफ मानना है की जिगर तो जिगर होता है भले ही 32 इंच का ही क्यों ना हो। कुरेदने पर छोटे नवाब बड़ी मासूमियत से कह गए कि वो सब पुरानी बातें हैं भूल जाइए। यकीन मानो - दुराचारी व बलात्कारी वाली बात को हम भूल ही गए हैं।

सजा है पर मजा है

सुनील वर्णवाल हाल के दिनों तक प्रदेश के सबसे ताकतवर ब्यूरोक्रेट थे। उनके एक इशारे पर लोग उठते बैठते थे। लेकिन वक्त हमेशा एक समान नहीं होता। दिन बुरे क्या हुए लोगों ने सताना शुरू कर दिया। इससे अधिक बुरा क्या होगा कि जो सबसे अधिक काम कर रहा था उसे दो महीने तक बिना किसी काम के ही रखा गया। इसके बाद काम के नाम पर एक ऐसी जगह पर रखा गया है जहां करने के लिए कुछ खास है ही नहीं। लेकिन, असर तो उलटा होता जा रहा है। करीबी लोग बताते हैं कि वर्णवाल इस सजा का आनंद उठाने में जुट गए हैं। वर्षों की थकान को दूर करने के लिए लगातार आराम का मौका जो मिला है। करीबी लोग बताते हैं कि वे इस मौके का भरपूर फायदा भी उठा रहे हैं और परिवार को भी वक्त दे रहे हैं।

Posted By: Alok Shahi

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