रांची [ कंचन कुमार ]।  झारखंड में एक बार फिर सरना कोड की मांग को लेकर आंदोलन तेज है। खास बात यह है कि इस आंदोलन की अगुवाई करनेवालों में ज्यादातर ऐसे नेता हैं जो आदिवासी से ईसाई बन चुके हैं। ऐसे नेता और उनसे जुड़े संगठन आदिवासियों के लिए सरना धर्म कोड की मांग कर रहे हैं। भाजपा समेत कई संगठन यह मुद्दा लगातार उठा रहे हैं कि सरना कोड की मांग के पीछे आदिवासियों की संस्कृति नष्ट करने की साजिश है और यह चर्च से संचालित है। ईसाई मिशनरियों ने बड़े पैमाने पर धर्मांतरण कर आदिवासियों को ईसाई बनाया है। जो धर्मांतरित आदिवासी हैं उन्हें दोहरा लाभ भी मिल रहा है।

गिरिजाघर में प्रार्थना व सरना की वकालत दोनों एक साथ नहीं चलेगी

पूर्व लोकसभा उपाध्यक्ष और खूंटी लोकसभा क्षेत्र का 8 बार प्रतिनिधित्व करने वाले कड़िया मुंडा का मानना है कि भोले आदिवासियों को बरगलाने के लिए सरना धर्म कोड की वकालत की जा रही है। उन्होंने कहा कि आदिवासियों की बात करने वाले लोगों को उनके हित-अहित का ख्याल रखना चाहिए। सरना धर्म कोड से आदिवासियों को कौन सी सुविधाएं बढ़ जाएंगी? जहां तक आदिवासी संस्कृति की बात है तो इस पर पहले खुद ईमानदार एवं वफादार बनना होगा।

बाहर सरना की बात करें और प्रार्थना करने गिरिजाघर पहुंचे। दोनों कैसे हो सकता है? जिस धर्म संस्कृति को बचाने की हम बात करते हैं, उसके प्रति पहले खुद आस्थावान एवं वफादार होना होगा। सरना धर्म कोड को लेकर राज्य में चल रही राजनीति को उन्होंने पूर्णत: अनुचित बताया। उन्होंने कहा कि दुनिया में किसी भी देश में किसी पूजा स्थल के नाम पर धर्म या फिर धर्म कोड नहीं है। हिंदू मंदिर में पूजा करते हैं तो क्या मंदिर धर्म है? ईसाई गिरिजाघर में पूजा करते हैं, तो क्या गिरिजाघर धर्म है?

जवाबदेह लोगों को मनन करना चाहिए कि वे क्या मांग रहे हैं

लोकसभा के पूर्व उपसभापति ने ने कहा कि मांगने का अधिकार तो सभी लोगों का है, लेकिन जवाबदेह लोगों को इस पर जरूर मनन करना चाहिए कि वे मांग क्या रहे हैं? इसमें हासिल क्या हो सकता है? इस तरह की मांग करनेवालों को यह भी पता नहीं है कि सिर्फ झारखंड या इसका कुछ इलाका ही देश नहीं है। कई जाति, धर्म एवं संप्रदाय के लोगों को समेटे हुए भारत एक बड़ा देश है। इसके कई क्षेत्रों में आदिवासी जाति के लोग निवास करते हैं। सरना झारखंड के आदिवासियों का पूजा स्थल है।

अन्य राज्यों में इसके अलग-अलग नाम एवं स्वरूप हैं? तो क्या अन्य राज्यों के आदिवासियों के लिए अलग-अलग धर्म कोड बनाया जाएगा? धर्म कोड कोई सामान्य चीज नहीं होती। संविधान के प्रावधानों के तहत ही इसका निर्माण किया जा सकता है। हर राज्य एवं घर के लिए अलग-अलग धर्म कोड नहीं हो सकता। यह पूरे देश के लिए होता है। झारखंड में लगभग एक करोड़ आदिवासी हैं। इसमें लगभग 20 लाख ईसाई बन गए हैं। जबकि देश में करीब 10-12 करोड़ आदिवासी हैं।

चर्च, ईसाई का नाम लेकर मूल मुद्दा से भटकाने की साजिश

मांडर के विधायक बंधु तिर्की सरना धर्म कोड को चर्च और ईसाई मिशनरी से जोडऩे को मूल मुद्दे से भटकाने की साजिश करार देते हैं। उनका कहना है कि आदिवासियों की अलग पहचान है और किसी भी मत को मानने से यह प्रभावित नहीं होता। चर्च का हवाला देकर और ईसाई मिशनरी पर आरोप लगाकर इस मुद्दे को डाइवर्ट नहीं किया जा सकता। यह सिर्फ आदिवासियों की मांग नहीं है। इस मांग में मूलवासी, कुड़मी आदि समुदाय का भी सक्रिय साथ मिल रहा है। जो लोग सरना धर्म कोड को सांस्कृतिक पहचान खत्म होने से जोड़ रहे हैं उन्हें यह बताना चाहिए कि अपने शासनकाल में उन्होंने क्या किया?

सरना कोड की मांग सांस्कृतिक पहचान को बनाने की कार्रवाई का हिस्सा

तिर्की ने कहा है कि राज्यसभा सदस्य समीर उरांव फिजूल की बातें कर नसीहत दे रहे हैं। उनके नसीहत की जरूरत नहीं है। उन्हें दिल्ली जाकर अपने आकाओं से पूछना चाहिए। पांच साल झारखंड में सरकार रहने के बावजूद समीर उरांव सरना धर्म कोड नहीं दिला पाए। आज चर्च को घसीटकर विवाद खड़ा करना चाहते हैं। सत्तारूढ़ गठबंधन के सभी दल धर्म कोड के मुद्दे पर एकजुट हैं। जल्दबाजी में कोई त्रुटि नहीं रह जाए, इसलिए सारी तैयारी कर प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जाएगा।

रही बात सांस्कृतिक पहचान नष्ट होने के भय का, तो यह सांस्कृतिक पहचान को बनाने की कार्रवाई का ही हिस्सा है। हमारी जनसंख्या लगातार घट रही है। सरना धर्म कोड से पहचान कायम होगी। जो लोग इसमें विभेद पैदा करना चाहते हैं वे झारखंड के सांस्कृतिक तानाबाना को नहीं समझते। पहले जो लोग आदिवासी-मूलवासी के बारे में बातचीत तक नहीं करना चाहते थे, उन्हें हमने इनकी ताकत से अवगत कराया है।

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