जागरण संवाददाता, रांची : बचपन के दिनों को याद कर 56 वर्षीय राजलक्ष्मी देवी कहती है कि दुर्गा पूजा मेरे लिए बहुत खास है। इनसे मेरी बचपन की कई यादें जुड़ी है। मुझे याद है कैसे हमें बेसब्री से माता रानी के आने का इंतजार रहता था। घर पर भी सभी लोग कई दिनों पहले से पूजा पर होने वाली तैयारियों में लग जाते थे। मेरे घर के पास ही पूजा क्लब था जहा मां की विशाल प्रतिमा लगती थी। और हम सारा दिन पूजा पंडाल खुलने के बाद पंडाल के आस पास ही रहते थे। हमारे मोहल्ले की लड़कियां बेलबरन पूजा के बाद मा की प्रतिमा को सजाती थी, मैं भी उनके साथ जाती थी। मां का रूप अलौकिक होता था। आरती के बाद बच्चों के द्वारा कई सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते थे। जिसमें गीत-संगीत, नृत्य और नाटक का मंचन होता था। सास्कृतिक कार्यक्रम तीन दिनों तक चलते थे जिसमे मुझे हमेशा ही गायन के लिए पुरस्कृत किया जाता था। प्रथमा से ही देवी की आराधना शुरू हो जाती थी। षष्ठी की शाम को बेलबरन के साथ ही हम बच्चे दुर्गा बाड़ी में रहते थे। हम देखते थे कि कैसे मां को निर्मयी से चिन्मयी बनाया जाता है। निर्मयी का मतलब है कि मिट्टी की देवी में प्राणप्रतिष्ठा करना जिससे मूर्ति में देवी का भाव आता है। तरह षष्ठी की शाम से लेकर सप्तमी, अष्टमी, नवमी और दशमी पूजा और कार्यक्रम में बहुत उल्लास के साथ भाग लेते थे।

पूजा में लगने वाले मेले की बात भी बहुत निराली थी। अब वैसे मेल नही लगते, जिसे अब मैं बहुत याद करती हूं और अपने नाती को बताती हूं। बाबूजी हमे रोज सुबह पूजा के बाद पैसे दिया करते थे और हम बच्चे मिल कर उनसे मिठाईयों से ज्यादा झूले झूला करते थे।

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