मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई राज्य 20 सूत्री कार्यान्वयन समिति की बैठक में बनीं सहमति

-लेकिन नियोजन और शैक्षणिक प्रयोजन के लिए नहीं हो सकेगा इसका इस्तेमाल राज्य ब्यूरो, राची : झारखंड में अत्यंत पिछड़ा वर्ग व पिछड़ा वर्ग को अब बार-बार जाति प्रमाणपत्र लेने की बाध्यता से मुक्तिमिलेगी। मुख्यमंत्री रघुवर दास की अध्यक्षता में बुधवार को राज्य 20 सूत्री कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति की बैठक में इस बाबत सहमति बनीं। तय किया गया कि राज्य में अब अत्यंत पिछड़ा वर्ग और पिछड़ा वर्ग के लिए एक ही बार जाति प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा। हालांकि, इस प्रमाणपत्र का उपयोग वे शैक्षणिक और नियोजन के किसी भी प्रयोजन के लिए नहीं कर सकेंगे। स्पष्ट है कि आरक्षण का लाभ लेने की स्थिति में यह जाति प्रमाणपत्र मान्य नहीं होगा।

राज्य 20 सूत्री कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति की बैठक में सांसद रामटहल चौधरी ने यह मामला उठाया। कहा, जब जाति नहीं बदलती तो इसे बार-बार क्यों जारी कराना पड़ता है। मुख्यमंत्री ने भी इस सवाल को वाजिब मानते हुए कार्मिक विभाग से स्थिति स्पष्ट करने को कहा। कार्मिक विभाग के अपर प्रधान सचिव केके खंडेलवाल ने अधिकारियों से परामर्श के बाद कहा कि झारखंड में बीसी-1 और बीसी-2 के लिए ऐसा किया जा सकता है।

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अभी क्या है प्रावधान

भारत सरकार की नियमावली कहती है कि समाप्त हुए वित्तीय वर्ष से पहले के तीन वित्तीय वर्ष अगर किसी व्यक्तिकी आय कृषि व वेतन को छोड़कर आठ लाख रुपये से ज्यादा है तो वह क्रीमी लेयर में चला जाएगा और उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। झारखंड में भी पिछड़ा और अत्यंत पिछड़ा वर्ग के लिए यही नियमावली अपनाई जा रही है। इसका सीधा असर यह होता है कि ओबीसी के लिए हर साल जाति प्रमाणपत्र बनवाना होता है। अब आने वाले समय में सरकार इसे हमेशा के लिए जारी कर सकती है। हालांकि इसका उपयोग शैक्षणिक और नियोजन के प्रयोजन के लिए नहीं किया जा सकेगा। जाति प्रमाणपत्र में आय वाले कालम को भी खाली छोड़ा जा सकता है।

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