दिलीप कुमार, रांची। पुलिस के गुप्तचर यानी स्पेशल पुलिस अफसर (एसपीओ) इन दिनों खतरे में हैं। इन्हें खतरा इनकी पहचान से है, जो इनके आधार कार्ड से उजागर हो रही है। गुप्तचरों के लिए काल उनका ही आधार बन गया है। 'आधार : आम आदमी का अधिकार' वाला स्लोगन पुलिस के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है। जिन गुप्तचरों की बदौलत पुलिस अपराधियों-नक्सलियों पर नकेल कसने में सफलता हासिल करती है, ये गुप्तचर अब पुलिस से पीछा छुड़ाने की कोशिश में हैं। अब उन्हें अपनी जान पर आ पड़ी है। उनकी पहचान एक-एक कर उजागर होती जा रही है।

यह पहचान कोई और उजागर नहीं कर रहा, बल्कि इन गुप्तचरों के बैंक खातों से उनका ब्योरा लीक हो रहा है। ये वही बैंक खाते हैं, जिसमें पुलिस मुख्यालय गुप्तचर फंड की 3000 रुपये प्रति माह की राशि भेजती रही है। अब बैंकों में जब से आधार कार्ड व पैन कार्ड लिंक्ड होने लगा है, अपराधियों व नक्सलियों की नजर वैसे खातों पर है। वे खाते से उस व्यक्ति का पता लगा रहे हैं, जो उनकी सूचनाओं को लीक कर रहा है।

पुलिस मुखबिरी में 13 साल में मार दिए गए 307 लोग

राज्य में वर्तमान में करीब 5000 एसपीओ (गुप्तचर) हैं। वर्ष 2005 से 2017 तक यानी 13 साल के भीतर 307 लोग पुलिस मुखबिरी में मारे जा चुके हैं। पहले भी बैंक खाते में एसपीओ को 3000 रुपये मासिक भत्ता भेजा जाता था, लेकिन जब से आधार व पैन कार्ड की बाध्यता हो गई, तब से ही गुप्तचर परेशान हैं।

गुमला में आया है पहचान उजागर होने का पहला मामला

गुमला में पहचान उजागर होने का पहला मामला सामने आया है। वहां कई गुप्तचरों की पहचान उजागर हो गई। इसका खुलासा तब हुआ, जब उनका नाम सार्वजनिक हुआ। अब उन्हें अपनी जान पर बन पड़ी है। वे खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं।

एसपीओ को भुगतान के लिए अलग विधि अपनाने पर बन रहा विचार

पहचान उजागर होने की घटना के बाद से ही पुलिस मुख्यालय परेशान है। एसपीओ पुलिसिंग की रीढ़ माने जाते हैं, जिनकी बदौलत विधि-व्यवस्था को दुरुस्त करने में मदद मिलती है। जब सूचनाएं ही बंद हो जाएंगी तो सबकुछ खत्म हो जाएगा। ऐसी स्थिति में अब पुलिस मुख्यालय एसपीओ को भुगतान के लिए अलग विधि अपनाने पर विचार कर रहा है।

'जानकारी मिली है। मामला गंभीर है। इस समस्या का शीघ्र समाधान निकाला जाएगा। इसके लिए सरकार से बात की जाएगी।'

-आरके मल्लिक, एडीजी ऑपरेशन सह प्रवक्ता, झारखंड पुलिस।

 

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