विनोद श्रीवास्तव, रांची। झारखंड की राजधानी रांची में पले-बढ़े भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धौनी के बल्ले ने जहां विश्व फलक पर देश के साथ रांची को भी पहचान दिलाई, वहीं इससे इतर यहां के ही अंतरराष्ट्रीय पिच पर बल्लेबाजी का जौहर दिखा चुके राज्य के दिव्यांग क्रिकेटरों का बल्ला धीरे-धीरे मौन पड़ गया है। राज्य के लगभग डेढ़ सौ दिव्यांग क्रिकेटरों की आस मौजूदा सिस्टम की भेंट चढ़ चुकी है। अंतरराष्ट्रीय मैच तक के लिए खुद प्रायोजक ढूंढना पर रहा है।

दिव्यांग क्रिकेटरों की इस टीम में से मुकेश कंचन, निशांत, विपुल, विजय और राजू अंतरराष्ट्रीय मैचों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं। 2015 में आयोजित एशिया कप में इसी टीम के मुकेश कंचन ने कप्तानी करते हुए 83 रनों का स्कोर खड़ा किया था और दिव्यांग क्रिकेट में भारत का परचम लहराया था। रांची आने पर इस टीम का न सिर्फ जोरदार स्वागत हुआ था, बल्कि राज्य सरकार ने सामान्य क्रिकेट खिलाड़ियों की ही तरह दिव्यांग खिलाड़ियों को सारी सुविधाएं देने की घोषणा की थी। दुर्भाग्य यह कि सुविधाएं तो दूर, आज वही सरकार इस टीम से मिलने तक से कतरा रही है। मुकेश श्रीलंका, बांग्‍लादेश, मलेशिया, सिंगापुर और थाईलैंड में आयोजित अंतरराष्‍ट्रीय क्रिकेट मैचों में अपनी बल्‍लेबाजी का प्रतिभा दिखा चुका है।

अपने बूते बनाई दिव्यांग क्रिकेटरों की संस्था

जब इन दिव्यांग क्रिकेटरों को किसी का सहारा नहीं मिला तो मुकेश ने अपने बूते दिव्यांगों की एक संस्था (डिसेबल स्पोर्टस एवं जन उत्थान समिति) खड़ी कर डाली। राज्य के लगभग डेढ़ सौ दिव्यांगों को इस संस्था से जोड़ा। चंदा कर क्रिकेट किट जुटाया और अपने अन्य साथी खिलाड़ियों के साथ उन्हें प्रशिक्षण देना शुरू किया। इसे मुकेश का आत्मबल ही कहे, उसकी टीम से चार खिलाड़ी जहां नेशनल खेल चुके हैं, वहीं राज्यस्तरीय प्रतिस्पर्धा में भाग लेने वाले खिलाडिय़ों की लंबी कतार है। लेकिन, अब कंचन की हिम्मत जवाब दे रही है। वह बुझे मन से कहता है, जब सवाल रोटियों का हो तो खेल-कूद हाशिये पर सिमट आता है। 21 से 23 फरवरी के बीच रांची में ही नेपाल बनाम भारत दिव्यांग मैच है। विदेशी खिलाड़ियों की आवभगत के लिए प्रायोजक ढूंढ रहा हूं। अगर यही स्थिति रही तो क्रिकेट की राह पर शायद और आगे नहीं बढ़ सकूंगा।

पोलियो ड्राप ने मुकेश को बना दिया दिव्‍यांग

मुकेश जब एक वर्ष का था, पोलियो की दो बूंद ने उसे सदा के लिए अपंग बना दिया। यह बात अजीब भले लगे, परंतु सच यही है। इसका प्रमाण उससे एक वर्ष बड़ा उसका ममेरा भाई भी है। दोनों ने एक साथ पोलियो की खुराक ली थी और अस्पताल से घर पहुंचते ही दोनों लड़खड़ा कर गिर पड़े।

क्रिकेट मैदान में मुकेश कंचन। 

दूसरे राज्‍यों में भी जमकर बोला मुकेश का बल्‍ला

क्रिकेट के प्रति बचपन से ही मुकेश का झुकाव रहा है। 2013-14 में लखनऊ, नागपुर, इंफाल, बेंगलुरु, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, दिल्ली, आगरा आदि शहरों में उसने खूब चौके-छक्के लगाए। 2014 में उसे भारतीय टीम में जगह मिली। बांग्लादेश के विरुद्ध आगरा के एकलव्य स्टेडियम में उसने भारत के लिए 48 रन बनाए। वह कहता है इस मैच में बांग्लादेश की टीम विजयी रही थी। ताजमहल ट्राफी लेकर जब बांग्लादेश की टीम अपने देश पहुंची तो वहां की सरकार ने न सिर्फ आगे बढ़कर उसका स्वागत किया, बल्कि उस टीम को वह सारी सुविधाएं मिली, जो एक सामान्य खिलाडिय़ों को मिलती है। काश, यह स्थिति भारत में भी होती।

क्रिकेट मैदान में मुकेश कंचन। 

बीसीसीआइ दे साथ तो बन जाए बात

मुकेश कहता है बीसीसीआई ने भारतीय क्रिकेट टीम में महिलाओं को जगह दी तो महिलाओं ने विश्व को अपनी ताकत का एहसास करा दिया। अगर बीसीसीआई यही उदारता दिव्यांगों के साथ दिखाए तो बात बन जाए। लेकिन हम दिव्यांगों के लिए कदम कौन बढ़ाएगा। घूम फिरकर आस सरकार पर जाती है, परंतु वह यह कहकर पल्ला झाड़ ले रही रही है कि क्रिकेट की संबद्धता भारतीय ओलंपिक संघ से नहीं है। लिहाजा वह मदद नहीं कर सकती है। फिर आटोनोमस बाडी होकर हम दिव्यांगों का दर्द बीसीसीआई क्यों ले? हां, लोढ़ा कमेटी ने दिव्यांग क्रिकेटरों के हित की अनुशंसा की थी, परंतु कमेटी की सिफारिशों को लागू करने के लिए दबाव कौन बनाएगा।

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By Sachin Mishra