रांची : देश की पहली महिला आदिवासी कथाकार एलिस एक्का की कहानियों का संग्रह एवं 'आदिवासी दर्शन और साहित्य' का लोकार्पण रविवार को सूचना भवन सभागार में किया गया। दोनों पुस्तकों का संपादन झारखंड की जानी-मानी विदुषी संस्कृतिकर्मी वंदना टेटे ने किया। लोकार्पण विनोद कुमार, शिशिर टुडू, पीटर पॉल एक्का, सिद्धार्थ एक्का, डॉ. माया प्रसाद और अणिमा बिरजिया ने संयुक्त रूप से किया।

पीटर एक्का ने एलिस की कहानियों को दिलों की गहराई में उतरनेवाली कहानी बताया। उपन्यासकार विनोद कुमार ने कहा कि इन कहानियों में सकारात्मक दृष्टि दिखाई देती है। आजादी का नया-नया दौर था, इसलिए हर लोगों ने नेहरू के सपने का स्वागत किया। लेकिन, बाद में जब मोहभंग हुआ तब वह उल्लास गायब हो गया। एलिस ने दलित समाज पर भी कहानी लिखी।

एलिस के बेटे सिद्धार्थ एक्का मां के बारे में बताया कि मां सब्जी वालों से घंटों बात करती थीं और यहीं से वे अपनी कहानियां का विषय लेती थीं। माया प्रसाद ने वंदना टेटे के इस कार्य की सराहना करते हुए कहा कि वे अपनी विरासत को सहेजने का महत्ती कार्य कर रही हैं।

शिशिर टुडू ने आदिवासी दर्शन पर अपने विचार रखते हुए कहा कि इस पुस्तक से आदिवासी दर्शन के बारे में पता चलता है। यह मुख्यधारा से इतर है। आदिवासी दर्शन से ही दुनिया बचेगी। आज जो गलाकाट प्रतियोगिता और विकास की अंधी हवा बह रही है, वह सृष्टि के लिए ही खतरा है। मुख्य धारा के दर्शन में मनुष्य श्रेष्ठ है जबकि आदिवासी दर्शन में वह एक इकाई है। जैसे पहाड़ है, झरना है, उसी प्रकार मनुष्य भी है।

धन्यवाद ज्ञापन अश्विनी कुमार पंकज व संचालन सावित्री ने किया। इस मौके पर अरविंद अविनाश, शेषनाथ वर्णवाल, रतन तिर्की, महादेव टोप्पो, निराला सहित काफी संख्या में लोग उपस्थित थे।

--------------

'आदिवासी दर्शन और साहित्य'

'आदिवासी दर्शन और साहित्य' आदिवासी साहित्य विमर्श को नया आयाम देते लेखों का संकलन है। संकलन में जयपाल सिंह मुंडा, हेरॉल्ड सैमसन तोपनो, रोज केरकेट्टा, सेम तोपनो, वाल्टर भेंगरा 'तरुण', रेमिस कंडुलना, जोवाकिम तोपनो, गीताश्री उराव, गंगा सहाय मीणा, अनुज लुगुन, ग्लैडसन डुंगडुंग, डॉ. सावित्री बड़ाइक और कृष्णमोहन सिंह मुंडा सहित वंदना टेटे के वैचारिक आलेख सम्मिलित हैं। पुस्तक का प्रकाशन विकल्प प्रकाशन, दिल्ली ने किया है।

--------

बिरसा मुंडा के खानदान से थीं एलिस

एलिस एक्का झारखंड की पहली महिला आदिवासी ग्रेजुएट थीं। उन्होंने चालीस-पचास के दशक में रचनाएं लिखनी शुरू की, जिनमें कथा साहित्य प्रमुख है। उन्होंने विदेशी साहित्य का अनुवाद भी किया। विशेषकर अपने प्रिय दार्शनिक लेखक खलील जिब्रान का। वे मुंडा समुदाय के पूर्ति गोत्र से थीं और उनका परिवार बिरसा मुंडा के खानदान से संबंधित है। उलगुलान विद्रोह के ठीक पहले उनके दादा उलीहातु छोड़कर सिमडेगा जा बसे थे। एलिस ने हिंदी में कहानिया लिखी और जीते जी उनका कोई संग्रह प्रकाशित नहीं हो पाया। उनकी मृत्यु के लगभग चार दशक बाद वंदना टेटे ने एलिस एक्का की रचनाओं को सामने लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।

--------------