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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 19, 2019 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

1995 में पहली बार रामगढ़ सीट पर भाजपा का कब्जा हुआ था

By JagranEdited By:
Published: Tue, 19 Nov 2019 07:44 PM (IST)

1995 में पहली बार रामगढ़ सीट पर भाजपा का कब्जा हुआ था।

1995 में पहली बार रामगढ़ सीट पर भाजपा का कब्जा हुआ था
1995 में पहली बार रामगढ़ सीट पर भाजपा का कब्जा हुआ था

तरुण बागी, रामगढ़ : 1995 में पहली बार रामगढ़ सीट पर भाजपा का कब्जा हुआ था। 1985 व 1990 के विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी शंकर चौधरी को लगातार हार का मुंह देखना पड़ा। 1995 में अविभाजित बिहार विधान सभा चुनाव में तीसरी बार भाजपा ने शंकर चौधरी को प्रत्याशी बनाया। इसमें भाजपा प्रत्याशी को जीत मिली। कांटे के मुकाबले में भाकपा प्रत्याशी सब्बीर अहमद कुरैशी उर्फ भेड़ा सिंह को 1700 मतों के अंदर से हराकर भाजपा प्रत्याशी ने जीत हासिल की। लेकिन 2000 में हुए चुनाव में उसवक्त के भाजपाइयों ने भाजपा विधायक शंकर चौधरी का विरोध कर दिया। अंतत: भाजपाइयों के विरोध व भीतरघात के कारण भाजपा प्रत्याश शंकर चौधरी को हार का मुंह देखना पड़ा। भाजपाइयों के भीरतघात के कारण ही भाकपा प्रत्याशी भेड़ा सिंह ने भाजपा से रामगढ़ की सीट छिन लिया। हालांकि विधायक बनने के महज छह-सात माह के दौरान ही भेड़ा सिंह का निधन हो गया। इसके बाद राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी को विधान सभा की सदस्यता दिलाने के लिए 2001 में हुए रामगढ़ विस उप चुनाव में भाजपा का प्रत्याशी बनाया गया। इसमें बाबूलाल मरांडी ने करीब 20 हजार मतों के अंतर से भाकपा प्रत्याशी व स्व. भेड़ा सिंह की पत्नी नादरा बेगम को हराकर रामगढ़ सीट से भाजपा का कब्जा दिलाया। इसके बाद 2005 व 2009 में रामगढ़ सीट पर भाजपा प्रत्याशी को हार का ही मुंह देखना पड़ा। हालांकि 2014 में भाजपा-आजसू गठबंधन से रामगढ़ सीट आजसू के खाते में चले जाने के कारण रामगढ़ सीट पर आजसू प्रत्याशी के रूप में चंद्रप्रकाश चौधरी ने रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल की थी। इससे पहले भी भाजपा को हराकर 2005 व 2009 में आजसू प्रत्याशी चंद्रप्रकाश चौधरी को ही जीत मिली थी।