टाटा स्टील को बचाने के लिए दांव पर लगाया अपना बेशकीमती हीरा, ऐसी थीं लेडी मेहरबाई टाटा; महिलाओं की बुलंद आवाज बनीं
लेडी मेहरबाई टाटा ने जुबली डायमंड गिरवी रखकर टाटा स्टील को आर्थिक संकट से बचाया और महिला अधिकारों की प्रबल ...और पढ़ें

घोड़े पर सवार लेडी मेहरबाई। जागरण
HighLights
टाटा स्टील के लिए लेडी मेहरबाई टाटा ने दांव पर लगाया जुबली डायमंड।
साड़ी पहनकर टेनिस खेलती थीं मेहरबाई टाटा, जीती थीं 60 से अधिक ट्रॉफियां।
लेडी मेहरबाई टाटा का त्याग और समाजसेवा आज भी देता है प्रेरणा।
स्वामी नंदन, वेस्ट बोकारो (रामगढ़)। इतिहास में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान सिर्फ उनकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि समाज पर छोड़ी गई अमिट छाप से होती है। लेडी मेहरबाई टाटा ऐसी ही एक प्रेरणादायी शख्सियत थीं।
महिला अधिकारों की प्रबल समर्थक, कुशल टेनिस खिलाड़ी, संगीत प्रेमी और समाजसेवी के रूप में उन्होंने अपने समय की रूढ़ियों को चुनौती दी। उनकी दूरदर्शिता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब टाटा स्टील आर्थिक संकट से जूझ रही थी, तब उन्होंने अपने सबसे प्रिय हीरे ‘जुबली डायमंड’ को भी कंपनी को बचाने के लिए दांव पर लगाने में संकोच नहीं किया।
10 अक्टूबर 1879 को बंबई (वर्तमान मुंबई) में जन्मी मेहरबाई मैसूर राज्य के शिक्षा महानिरीक्षक एच. जे. भाभा की इकलौती पुत्री थीं। प्यार से उन्हें ‘मेहरी’ कहा जाता था। 14 फरवरी 1898 को उनका विवाह टाटा समूह के संस्थापक जमशेदजी नुसरवानजी टाटा के ज्येष्ठ पुत्र सर दोराबजी टाटा से हुआ। विवाह के बाद उन्होंने अपने जीवन को केवल परिवार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि समाज में बदलाव लाने के लिए भी लगातार काम किया।
1920 के दशक में टाटा स्टील गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रही थी। कंपनी को संभालने के लिए सर दोराबजी टाटा ने अपनी निजी संपत्ति तक दांव पर लगा दी। इस कठिन समय में लेडी मेहरबाई अपने पति के साथ मजबूती से खड़ी रहीं।
उन्होंने अपना बेहद कीमती जुबली डायमंड भी गिरवी रखने के लिए दे दिया। यह सिर्फ एक बहुमूल्य हीरे का त्याग नहीं था, बल्कि उस औद्योगिक संस्थान के प्रति विश्वास का प्रतीक था, जिसके भविष्य में देश की प्रगति की संभावनाएं छिपी थीं। उनके इस त्याग ने टाटा स्टील को संकट से उबरने में मदद की। आगे चलकर यही कंपनी भारत के औद्योगिक विकास और आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली वैश्विक कंपनी बनी।
मेहरबाई और सर दोराबजी के निधन के बाद जुबली डायमंड बेच दिया गया। इससे प्राप्त धनराशि सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट को दी गई। इस ट्रस्ट ने शिक्षा, स्वास्थ्य, वैज्ञानिक अनुसंधान, ग्रामीण विकास और राष्ट्र निर्माण से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण कार्यों को आगे बढ़ाया। इस तरह मेहरबाई के त्याग की कहानी एक कंपनी को बचाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि समाज कल्याण के अनेक कार्यों से भी जुड़ गई।
मेहरबाई उस दौर में महिलाओं के अधिकारों की बात कर रही थीं, जब समाज में महिलाओं की शिक्षा और स्वतंत्रता को लेकर कई तरह की बंदिशें थीं। उन्होंने बालिका शिक्षा, महिलाओं की उच्च शिक्षा और समान अवसरों की वकालत की।
पर्दा प्रथा और छुआछूत जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी उन्होंने आवाज उठाई। महिला संगठनों को मजबूत बनाने और भारत में महिला अधिकारों के आंदोलन को आगे बढ़ाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
ब्रिटिश उपनिवेशों में भारतीय मूल के अनुबंधित श्रमिकों के साथ होने वाले अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाकर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। बाल विवाह की रोकथाम के लिए बने शारदा अधिनियम के संदर्भ में भी उनसे परामर्श लिया गया था। इससे स्पष्ट होता है कि उनकी चिंता केवल महिलाओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे व्यापक सामाजिक सुधार की पक्षधर थीं।
मेहरबाई की पहचान केवल समाजसेवा तक सीमित नहीं थी। उन्हें खेल, साहित्य, संगीत और यात्राओं से भी गहरा लगाव था। वह एक बेहतरीन टेनिस खिलाड़ी थीं। उन्होंने वेस्टर्न इंडिया टेनिस टूर्नामेंट में तीनों खिताब जीते और अपने खेल जीवन में 60 से अधिक ट्रॉफियां हासिल कीं। खास बात यह थी कि वह पारंपरिक भारतीय परिधान साड़ी पहनकर पेशेवर स्तर पर टेनिस खेलने वाली चुनिंदा महिलाओं में शामिल थीं।
उन्हें पियानो बजाने का भी शौक था और वह संगीत कार्यक्रमों में अपनी प्रस्तुति के लिए जानी जाती थीं। मोटरगाड़ियों के प्रति उनका आकर्षण और दुनिया के विभिन्न हिस्सों की यात्राओं ने उनके अनुभवों को व्यापक बनाया। यात्राओं के दौरान उन्होंने अलग-अलग समाजों और महिलाओं की परिस्थितियों को करीब से देखा। उनकी सोच थी कि महिलाओं को भी शिक्षा, सम्मान और अपनी प्रतिभा दिखाने के समान अवसर मिलने चाहिए।
लगभग 50 वर्ष की आयु में मेहरबाई को ल्यूकेमिया यानी रक्त कैंसर हो गया। 18 जून 1931 को उनका निधन हो गया। हालांकि, उनके विचार और समाज के लिए किए गए कार्य आज भी जीवित हैं। उनकी स्मृति में स्थापित मुंबई का टाटा मेमोरियल अस्पताल कैंसर के उपचार, अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में देश के प्रमुख संस्थानों में शामिल है। जमशेदपुर का मेहरबाई टाटा मेमोरियल अस्पताल भी कैंसर उपचार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
लेडी मेहरबाई टाटा का जीवन इस बात का उदाहरण है कि वास्तविक नेतृत्व केवल पद, प्रतिष्ठा या संपत्ति से नहीं, बल्कि कठिन समय में लिए गए फैसलों और समाज के लिए किए गए कार्यों से पहचाना जाता है। उन्होंने एक ओर टाटा स्टील के कठिन दौर में त्याग और विश्वास का परिचय दिया, तो दूसरी ओर महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक समानता के लिए अपनी आवाज बुलंद की।
आज, उनके जन्मदिवस 10 अक्टूबर के अवसर पर उनकी जीवन यात्रा को याद करना केवल अतीत को नमन करना नहीं है, बल्कि उस सोच को आगे बढ़ाने का संकल्प भी है, जिसमें विकास का अर्थ केवल आर्थिक समृद्धि नहीं, बल्कि बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, समान अवसर और सम्मानजनक जीवन भी है। लगभग एक सदी बाद भी लेडी मेहरबाई टाटा की कहानी बताती है कि दूरदर्शिता और साहस से किया गया काम पीढ़ियों तक समाज को दिशा दे सकता है।
