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अपनों ने छोड़ा साथ, सड़क हादसे ने छीना चलने का सहारा; अब जिंदगी की जंग लड़ रहा सल्लू शेख

Published: Wed, 28 Oct 2026 04:04 PM (IST)

सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल सल्लू शेख पाकुड़ सदर अस्पताल के बाहर खुले आसमान के नीचे जीवन गुजारने ...और पढ़ें

अपनों ने छोड़ा साथ, सड़क हादसे ने छीना चलने का सहारा; अब जिंदगी की जंग लड़ रहा सल्लू शेख

अपनों ने छोड़ा साथ, सड़क हादसे ने छीना चलने का सहारा; अब जिंदगी की जंग लड़ रहा सल्लू शेख

HighLights

  1. सड़क हादसे में सल्लू शेख के पैर गंभीर रूप से चोटिल।

  2. अस्पताल से छुट्टी के बाद खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर।

  3. स्थानीय लोग और मुखिया प्रशासन से मदद की गुहार लगा रहे।

चंदन रक्षित, पाकुड़। जिंदगी की गाड़ी किसी तरह चल रही थी। पेट भरने के लिए सल्लू शेख कभी लोगों के सामने हाथ फैलाते, तो कभी कोई काम मिल जाता तो उसे कर लेते थे। गरीबी ने पहले ही उनकी जिंदगी को मुश्किल बना रखा था।

किसी तरह दिन कट रहे थे, लेकिन करीब डेढ़ माह पहले हुए एक सड़क हादसे ने उनकी जिंदगी को और भी दर्दनाक बना दिया।

पाकुड़-हिरणपुर सड़क पर एक हाइवा की टक्कर ने उनके पैरों को इस कदर चोटिल कर दिया कि अब वह ठीक से खड़े भी नहीं हो पा रहे हैं।

किसी तरह जीवनयापन करने वाले सल्लू आज दो वक्त की रोटी जुटाने में भी असमर्थ हैं। हादसे ने उनसे चलने-फिरने का सहारा छीन लिया और अब जिंदगी की हर जरूरत दूसरों की मदद पर निर्भर हो गई है।

पश्चिम बंगाल के मुरारोई निवासी करीब 50 वर्षीय सल्लू शेख की कहानी किसी का भी दिल पसीजने के लिए काफी है। हादसे के बाद पाकुड़ पुलिस ने मानवीय पहल करते हुए उन्हें इलाज के लिए सदर अस्पताल में भर्ती कराया था। कुछ दिनों तक उनका इलाज चला, लेकिन पैरों की स्थिति में सुधार नहीं हो सका।

सल्लू का आरोप है कि इसके बाद उन्हें अस्पताल से बाहर कर दिया गया। यदि अस्पताल में उनके इलाज की समुचित व्यवस्था नहीं थी, तो उन्हें बेहतर इलाज के लिए दूसरे अस्पताल में रेफर किया जाना चाहिए था। फिलहाल वह अस्पताल के बाहर सड़क किनारे खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं।

आठ दिनों से खुले आसमान के नीचे कट रही जिंदगी

सल्लू के लिए अब हर दिन किसी बड़ी परीक्षा से कम नहीं है। जहां आम लोग अपने पैरों पर खड़े होकर जिंदगी की जरूरतें पूरी करते हैं, वहीं सल्लू के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाना भी मुश्किल हो गया है। पिछले आठ दिनों से अस्पताल के बाहर जमीन पर पड़े सल्लू की जिंदगी राहगीरों की मदद पर टिकी है।

अपनों ने भी नहीं थामा हाथ

सल्लू की पीड़ा केवल शारीरिक नहीं है। उनकी जिंदगी में अपनों की बेरुखी का दर्द भी शामिल है। बचपन में ही माता-पिता का साया सिर से उठ गया था।

परिवार में मामा हैं, लेकिन सल्लू के अनुसार, उन्होंने भी उनकी सुध नहीं ली। ऐसे में हादसे से पहले भी वह किसी तरह अपना जीवन गुजार रहे थे। अब पैरों में गंभीर चोट के कारण उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

जिस शरीर के सहारे वह अब तक अपनी जरूरतें पूरी करते थे, वही अब उनका साथ नहीं दे रहा। न परिवार का सहारा है और न ही भविष्य को लेकर कोई स्पष्ट उम्मीद।

लोगों ने जताई चिंता, प्रशासन से मदद की गुहार

सड़क किनारे इस हालत में पड़े सल्लू को देखकर स्थानीय लोग भी चिंतित हैं। उन्होंने प्रशासन से सल्लू के इलाज, भोजन और रहने की व्यवस्था करने की मांग की है। पंचायत की मुखिया सुषन्ना मरांडी ने बताया कि वह फिलहाल बाहर हैं और पंचायत सचिव से बात करेंगी।

वहीं, सदर अस्पताल के प्रभारी उपाधीक्षक डॉ. अमित कुमार ने कहा कि उन्हें इस मामले की जानकारी नहीं है। अस्पताल के उपाधीक्षक छुट्टी पर हैं और वह कुछ दिनों के लिए प्रभार में हैं। मामले की जांच कराकर जानकारी ली जाएगी।