777 सीढ़ियां चढ़ते ही पूरी होती है मनोकामना! कोडरमा के ध्वजाधारी धाम की अनोखी मान्यता; त्रेता युग से है नाता
झुमरीतिलैया (कोडरमा) स्थित ऐतिहासिक ध्वजाधारी धाम का विशेष महत्व है, जहां 777 सीढ़ियां चढ़कर श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक करते ...और पढ़ें

ध्वजाधारी धाम कोडरमा का एक प्रमुख धार्मिक स्थल।
संवाद सहयोगी, झुमरीतिलैया (कोडरमा)। अभ्रकांचल क्षेत्र कोडरमा की ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान में ध्वजाधारी धाम का विशेष स्थान है। जिला मुख्यालय में स्थित यह प्रसिद्ध धार्मिक स्थल कोडरमा के साथ-साथ झारखंड के विभिन्न जिलों, बिहार और बंगाल से आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है।
पहाड़ की चोटी पर स्थित शिवलिंग तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 777 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। चोटी पर पहुंचकर श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं और अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं।
ध्वजाधारी धाम का संचालन महंत महामंडलेश्वर सुखदेव दास के नेतृत्व में किया जा रहा है। धाम के प्रति लोगों की गहरी आस्था है। धार्मिक मान्यताओं के साथ यहां कई पारिवारिक और सामाजिक परंपराएं भी जुड़ी हैं। नया वाहन खरीदने के बाद लोग पूजा-अर्चना के लिए धाम पहुंचते हैं।
वहीं विवाह के लिए भी जिले और दूसरे क्षेत्रों से लोग यहां आते हैं और सुखमय वैवाहिक जीवन की कामना करते हैं। चुनाव में जीत हासिल करने के बाद कोडरमा लोकसभा और विधानसभा के विजेता प्रत्याशियों के यहां पहुंचकर मत्था टेकने की परंपरा भी बताई जाती है।
ध्वज और त्रिशूल चढ़ाने की परंपरा
धाम से जुड़ी मान्यता के अनुसार, त्रेता युग में भगवान ब्रह्मा के पुत्र कर्दम ऋषि ने यहां लंबे समय तक तपस्या की थी। मान्यता है कि उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें ध्वज और त्रिशूल के रूप में दर्शन दिए। इसी कारण यहां ध्वज और त्रिशूल चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है। कर्दम ऋषि के नाम से ही कोडरमा का नाम पड़ने की भी मान्यता है।
धाम की पहाड़ी पर शिव-पार्वती दरबार और हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित है। परिसर में राधा-कृष्ण मंदिर भी है। श्रद्धालु मन्नत पूरी होने के बाद यहां ध्वज और त्रिशूल चढ़ाते हैं। सावन की सभी सोमवारी पर धाम में जलाभिषेक के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। धार्मिक आस्था, लोक मान्यताओं और प्राकृतिक वातावरण के कारण ध्वजाधारी धाम कोडरमा की प्रमुख धार्मिक पहचान बना हुआ है।
