रणजीत भारती, जयनगर (कोडरमा) : भले प्रधानमंत्री मोदी पूरे देश में स्वच्छता अभियान चला देश की तस्वीर बदलने की चाहत रखते हों लेकिन स्वच्छता के ऐसे भी गुमनाम योद्धा हैं जिनके खून में स्वच्छता का जुनून है। हम बात कर रहे हैं 117 वर्ष के मित्रजीत सिंह की। चेहरे पर लटकती झुर्रियां, कमजोर काया, लेकिन इच्छाशक्ति उतना ही बुलंद। ऐसे व्यक्तित्व के धनी हैं जयनगर प्रखंड के गम्हारबाद गांव निवासी मित्रजीत ¨सह। उम्र के इस पड़ाव में भी स्वच्छता के प्रति उनका समर्पण देखते बनता है। उन्हें अपने जीवनकाल में पांचवीं पीढ़ी को देखने का सौभाग्य प्राप्त है, अब भी वह अपने सभी नाती-पोतों को स्वच्छता के लिए प्रेरित करते रहते हैं। बताते हैं कि करीब पचास वर्ष से क्षेत्र में लोगों को स्वच्छता व पर्यावरण ठीक रखने का महत्व समझाते आ रहे हैं। कभी पूरे गांव के साथ-साथ क्षेत्र में भी स्वच्छता अभियान चलाते थे। अब शरीर में ताकत नहीं रही तो भी अहले सुबह लाठी के सहारे गांव की गलियों को साफ सुथरा करते हैं। साथ ही गांव के युवकों, महिलाओं और अन्य लोगों को भी स्वच्छता का संदेश देते हैं। अब उम्र 117 वर्ष की हो चुकी है लेकिन न चश्मा लगाते हैं न ही दवा का प्रयोग करते हैं। स्वच्छता के प्रति इनके इस समर्पण को देख डोमचांच के एक चिकित्सक ने इन्हें सम्मानित भी किया और इनकी तस्वीर को प्रेरणा स्वरूप अपने क्लीनिक में लगा रखा है।

गांव की मुखिया अर्चना कुमारी बताती है कि जब बाबा थोड़ा बेहतर ढंग से चल फिर लेते थे, तब गांव में संध्या चौपाल लगाकर लोगों को स्वच्छता का संदेश देते थे फिर सुबह उठकर पूरे गांव में सफाई करते थे। इनसे प्रेरित होकर गांव की महिलाएं और युवक भी इनके साथ स्वच्छता अभियान में शामिल हो जाते थे। मित्रजीत सिंह कहते हैं स्वच्छता और पर्यावरण से प्रेम उन्हें बचपन से रहा है, किसी ने प्रेरित नहीं किया धीरे-धीरे यह आदत बन गई।

1901 में हुआ था जन्म

अक्षर ज्ञान तक सीमित मित्रजीत ¨सह के उम्र के संबंध वैसे तो कोई ठोस प्रमाण उनके पास उपलब्ध नहीं है, लेकिन वे अपने जन्म का वर्ष 1901 बताते हैं, जबकि आधार कार्ड में वर्ष 1903 अंकित है। दस बेटे-बेटियों में इनकी सबसे बड़ी बेटी फुलवा देवी का निधन हो चुका है, जबकि दूसरी बेटी मुनवा देवी की उम्र 72 वर्ष है। तीसरे नंबर पर पुत्र सकलदेव ¨सह, चौथे में लालजीत ¨सह, पांचवी अंजू देवी, छठा गुनाधर ¨सह, सातवां निर्मल ¨सह, आठवां मंजू देवी, नौवां अरूणा देवी, दसवां सिकंदर ¨सह। इनमें निर्मल ¨सह की भी मौत हो चुकी है। अपने युवावस्था के दिनों को याद कर बताते हैं कि वे 1930 में कोडरमा के बागीटांड स्थित माइका माइंस के कार्यालय में नौकरी करते थे। उस समय हजारीबाग कोर्ट था। जरूरत पड़ने पर वहां 65 किलोमीटर तक पैदल आते-जाते थे। 30 वर्ष पूर्व वज्रपात से उनकी पत्नी डालिया की मौत हो गई, उन्हें बड़ा सदमा लगा फिर भी उससे उबर अपने मिशन में लग गए।

Posted By: Jagran