खूंटी, जागरण संवाददाता। महाभारत के अर्जुन ने भीष्म पितामह को निहत्था होने के बाद शिखंडी की आड़ में लगातार वाणों की बौछार कर वाणशय्या पर ला दिया था। क्योंकि युद्ध जीतने के लिए पितामह को अलग करना जरूरी था। वे उनके प्रतिद्वंद्वी कौरव पक्ष की ओर से लड़ रहे थे। पितामह भले ही लड़ाई में कौरव पक्ष में थे, लेकिन दिल से पांडवों की ही विजय चाहते थे।

खूंटी के महाभारत में भी अर्जुन ने पितामह को निहत्था कर दिया है। वे टिकटलेस हो गए हैं। लेकिन अर्जुन ने उन्हें साथ रख लिया है। वे जहां भी जा रहे हैं, पितामह को साथ ले जाते हैं। यहां कृष्ण की भूमिका पर्दे के पीछे है। लेकिन वे बार-बार निर्देश दे रहे हैं- हे अर्जुन, पितामह को साथ लेकर चल। ताकि कहीं कोई दिक्कत पेश न आए।

वैसे अर्जुन भी धनुर्विद्या के साथ राजनीति में काफी माहिर हैं। हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं। पितामह को अपने प्यारे अर्जुन के लिए इस बुढ़ापे में भी काफी मेहनत करनी पड़ रही है। उम्र के ढलान पर आराम करने की बजाय लोगों को फूल सूंघा रहे हैं।

Posted By: Sujeet Kumar Suman

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