जमशेदपुर, निर्मल प्रसाद।  मजदूर पेपर्स लिमिटेड की परिसंपत्ति बारी मेंशन के निर्माण पर टाटा वर्कर्स यूनियन चार करोड़ रुपये खर्च करेगी। अखबार में यह बात आने के बाद से ही घमासान मच गया है। बिष्टुपुर स्थित बारी मेंशन टाटा वर्कर्स यूनियन की ही परिसंपत्ति है। 1938 में इसे यूनियन के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल बारी ने खरीदा था।

अब इस जर्जर हो चुके इमारत के निर्माण का मामला धालभूम अनुमंडल पदाधिकारी के कोर्ट में विचाराधीन है। बीते शुक्रवार को बारी मेंशन के निदेशक व टाटा स्टील, अर्बन सर्विसेज के पूर्व कमेटी मेंबर आरके सिंह ने कोर्ट को यह बताया है कि बारी मेंशन की नई इमारत के निर्माण पर टाटा वर्कर्स यूनियन चार करोड़ रुपये खर्च करेगी। वर्तमान में यूनियन के पास 36.70 करोड़ रुपये है, जो टाटा स्टील कर्मचारियों के चंदे के पैसे से जमा है। मजदूर पेपर्स लिमिटेड के चेयरमैन, यूनियन अध्यक्ष आर रवि प्रसाद हैं। कोर्ट में दिए बयान के बाद से पूरे मामले में घमासान मचा है।

महासचिव को नहीं है जानकारी

इस मामले में महासचिव सतीश कुमार सिंह से पूछा गया जो टाटा वर्कर्स यूनियन के संविधान और व्यवस्था के कस्टोडियन भी हैं, उनका कहना है चार करोड़ रुपये निवेश यूनियन द्वारा करने की जानकारी उन्हें नहीं है और न ही हाउस या ऑफिस बियरर को इसकी जानकारी दी गई है। यूनियन का जितना भी पैसा है उसके ब्याज से यूनियन कार्यालय के 33 कर्मचारियों का परिवार चलता है। इतनी बड़ी रकम दुकान बनाने में खर्च होनी चाहिए या नहीं, यह विचारणीय है। व्यक्ति विशेष से यूनियन नहीं चलता। आरके सिंह कौन होते हैं जो अपनी मर्जी से यह तय करें कि यूनियन किसे पैसा देगी।

कानूनी पचड़े में फंस सकती यूनियन

वर्तमान में मजदूर पेपर्स लिमिटेड का संचालन और व्यवस्था यदि यूनियन स्वयं करती तो इस पर विचार किया जा सकता था। अध्यक्ष आर रवि प्रसाद को छोड़कर बाकी सभी निदेशक व शेयरधारक बाहरी हैं। वे न तो टाटा स्टील के कर्मचारी हैं, ना यूनियन के कमेटी मेंबर। उनका बारी मेंशन में बने रहना सोचने वाली बात है। बिना अनुमति यदि चार करोड़ रुपये बारी मेंशन में निवेश होता है तो यूनियन कानूनी पचड़े में फंस सकती है।

ये कहते निदेशक

मजदूर पेपर्स लिमिटेड कंपनी, मजदूर की संस्था है। इसका मालिकाना हम यूनियन के पास बरकरार रहे इसीलिए कंपनी ने स्वेच्छा से सबसे पहले टाटा वर्कर्स यूनियन को निवेश का मौका दे रही है। इसके बदले यूनियन को कंपनी का शेयर भी मिलेगा। यदि यूनियन चाहे तो प्रस्ताव को अस्वीकार कर दे। कंपनी के पास कंपनी एक्ट के तहत धन जुटाने के और भी विकल्प उपलब्ध हैं। लेकिन इसके बाद मजदूर पेपर्स लिमिटेड का मालिकाना हक यूनियन खो देगी।

-नित्यानंद सिंह, निदेशक, मजदूर पेपर्स लिमिटेड 

Posted By: Rakesh Ranjan

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