जागरण संवाददाता, जमशेदपुर : टाटा बिजनेस एक्सीलेंस समूह की ओर से लोयोला स्कूल में आयोजित 'स्काई इज द लिमिट' नामक कार्यक्रम में अपने हौसलों की नई उड़ान छात्रों से साझा करते हुए दिव्यांग अरुणिमा सिन्हा ने कहा कि 12 अप्रैल 2011 को बरेली के निकट पद्मावती एक्सप्रेस से अपराधियों ने उन्हें ट्रेन से फेंक दिया था। तब वे राष्ट्रीय स्तर की वालीबॉल खिलाड़ी थीं और वे लखनऊ से दिल्ली जा रही थीं। जब उन्हें ट्रेन से फेंक दिया गया तो वे सात घंटे पटरी पर पड़ी रहीं, इस दौरान लगभग 45 ट्रेनें गुजरीं फिर भी वह जिंदा बच गई। शायद, खुदा ने कुछ इतिहास रचने के लिए ही उन्हें बचाया था। अरुणिमा ने छात्रों को बताया कि इस घटना के बाद जब वे अपने परिवार के सौजन्य से दिल्ली के एम्स में पहुंची तो उनके इलाज के दौरान एक अखबार उनके हाथ में आया, जिसमें उनके आत्महत्या की बात सामने आई थी। उस समाचार ने उन्हें काफी दुख पहुंचाया। लेकिन, उसी अखबार में पर्वतारोहण के बारे में एक आर्टिकल पढ़ा और भाई के साथ पर्वतारोहण की इच्छा जतायी। उस वक्त परिवार के अन्य सदस्यों ने सिर्फ नौकरी करने को कहा, लेकिन भाई ने हिम्मत बढ़ाई और वहीं पल मेरे जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद वह बचेंद्री पाल के संपर्क में आई और टाटा स्टील से बात हुई। फिर कठिन परिश्रम से माउंट एवरेस्ट चढ़ने में फतह हासिल की।

अरुणिमा ने छात्रों को बताया कि जब वह बचेंद्री पाल के सानिध्य में माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई करने का अभ्यास कर रही थीं तो लोग उसे पागल बोलते थे। कहते थे, जो लड़की ठीक से अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकती। वह क्या एवरेस्ट चढ़ेगी। लेकिन, उसने यह कर दिखाया। उन्होंने कहा कि जब आप प्राप्ति की दिशा में बढ़ रहे हैं और लोग आपको पागल कहें तो समझ लीजिए कि आप लक्ष्य की प्राप्ति अवश्य करेंगे और ऐसा ही हुआ। उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि अपनी मंजिल प्राप्त करने की ओर बढ़ने वाले पर कोई हंसता है तो वह इतिहास रचता है। उन्होंने छात्रों से अनुरोध किया कि जिन सीढि़यों से आप गुजरे हों उसे आप कभी मत भूलो।

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सपने के पीछे भागो : बचेंद्री

लोयोला स्कूल के फेशी ऑडिटोरियम में आयोजित 'स्काई इज द लिमिट' कार्यक्रम में पर्वतारोही सह एवरेस्ट फतह करने वाली प्रथम भारतीय महिला बचेंद्री पाल ने कहा कि ऊंची उड़ान के लिए छात्र सपना अवश्य देखे, लेकिन इन सपनों को सच करने के लिए इसके पीछे भागने की जरूरत है। उन्होंने अपनी सफलता साझा करते हुए बताया कि 1984 में माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई के दौरान 24 हजार फीट ऊपर जब वे और उनके साथी थे तो हिमस्खलन हुआ। इसमें कई साथी घायल हुए, जिन्हें बचाने के लिए अन्य लोग नीचे से ऊपर आये और सभी को अगले दिन सुबह बेस कैंप में लेकर गये। सभी से पूछा गया कि आप फिर से चढ़ाई करना चाहते हो तो टीम के अधिकतर सदस्यों ने कहा कि वे फिलहाल दोबारा चढ़ाई नहीं करेंगे, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और पुन: माउंट एवरेस्ट चढ़ने की बात कही। अगले दिन ही वे फिर से माउंट एवरेस्ट पर फतह को निकल पड़ी और उन्हें कामयाबी मिली। उन्होंने कहा कि वे जिस क्षेत्र से आती हैं, वहां उच्च शिक्षा का सपना ही बहुत बड़ा होता है। उन्हें स्कूली शिक्षा ग्रहण करने के लिए 60 किलोमीटर साइकिल चलाकर स्कूल जाना पड़ता था। जब उन्होंने माउंट एवरेस्ट फतह कर लिया तो लोग पूछते दोबारा अब माउंट एवरेस्ट कब चढ़ोगी। इस पर उनका जबाव होता कि अब वह दूसरों को प्रेरित करने का कार्य करेंगी। इसके बाद टाटा स्टील के सौजन्य से टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन का गठन किया और आज फक्र है कि मैंने कई पर्वतारोहियों को प्रशिक्षित किया, जिन्होंने माउंट एवरेस्ट चढ़ने में सफलता प्राप्त की। जिसने भी माउंट एवरेस्ट फतह किया, ऐसा लगा कि मैने माउंट एवरेस्ट दोबारा फतह कर लिया है।

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स्कूल में दौड़ नहीं पाती थी : प्रेमलता

'स्काई इज द लिमिट' कार्यक्रम में पर्वतारोही प्रेमलता अग्रवाल ने भी अपनी सफलता छात्रों से साझा की। कहा कि वे दार्जिलिंग में पली-बढ़ीं और 18 साल की उम्र में ही उनकी शादी हो गई। उन्हें न अंग्रेजी ठीक से बोलने आती है और ना ¨हदी। नेपाली स्कूल में पढ़ने के कारण वह नेपाली खूब अच्छी तरह से बोल लेती हैं। स्कूल के जीवन में उन्होंने कई दौड़ प्रतियोगिता में भाग लिया। लेकिन, उन्हें कभी पुरस्कार नहीं मिला। वे हमेशा पीछे रह जातीं थीं। लोग बोलते थे, छोड़ दो जीतने वाला तो जीत गया। लेकिन, मैं टारगेट तक पहुंचकर ही दम लेती थी, भले देर से ही सही। हारकर भी उसे हार नहीं मानती थी। इसी ललक से 48 साल की उम्र में बचेंद्री पाल के संपर्क में आयी और कुछ अलग करने के इरादे से पर्वतारोहण करने का अभ्यास किया और माउंट एवरेस्ट को फतह किया। उन्होंने कहा कि इसके बाद 51 वर्ष की उम्र में उन्हें कोलकाता में मैराथन दौड़ में भाग लेने का मौका मिला और वहां उन्हें दूसरा स्थान प्राप्त हुआ, तब उन्हें स्कूल दिनों की याद आई।

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छात्रों के सवाल

सवाल : जब पहली बार माउंट एवरेस्ट पर झंडा गाड़ा तो देश को क्या संदेश दिया?

अरजित साहू, जेपीएस

प्रेमलता अग्रवाल : हम कर सकते हैं, हमने कर दिखाया।

बचेंद्री पाल : हमने यह मिथक तोड़ा कि पर्वतारोहण पुरुष नहीं महिलाएं भी कर सकती हैं।

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सवाल : दुर्घटना के बाद आत्मविश्वास कैसे?

विकास कुमार, विवेक विद्यालय

बचेंद्री पाल : दुर्घटनाओं से डरकर भागना नहीं चाहिए, बल्कि उसका डटकर सामना करना चाहिए। उस समय हमेशा अपने दिल की आवाज सुननी चाहिए जो आपका आत्मविश्वास बढ़ाता है।

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सवाल : परिवार व पर्वतारोहण के लिए समय कैसे निकाला ?

-सौम्या तिवारी, संत नंदलाल विद्यालय घाटशिला

प्रेमलता अग्रवाल : किसी भी मनुष्य की सफलता में उसके परिवार का बहुत बड़ा हाथ होता है। परिवार को लेकर ही चलना पढ़ता है। समय का सदुपयोग कर पर्वतारोहण के लिए समय निकाला।

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