जमशेदपुर में बोले 'तारक मेहता' फेम शैलेश लोढ़ा: मोबाइल ने युवाओं को किताबों से दूर किया, कलम से ही आती है क्रांति
जमशेदपुर में शैलेश लोढ़ा ने हास्य में बढ़ती फूहड़ता पर चिंता जताई और युवाओं को मोबाइल के कारण किताबों से ...और पढ़ें

अपने चर्चित हास्य नाटक 'डैड्स गर्लफ्रेंड' के सफल मंचन के सिलसिले में जमशेदपुर पहुंचे तारक मेहता फेम शैलेश लोढ़ा।
HighLights
हास्य में बढ़ती फूहड़ता समाज के लिए बेहद घातक है।
मोबाइल ने युवाओं को किताबों और इतिहास से दूर किया।
समाज में क्रांतियां हमेशा लेखकों की कलम से ही आती हैं।
निर्मल प्रसाद, जमशेदपुर । देश के प्रख्यात कवि और प्रसिद्ध अभिनेता शैलेश लोढ़ा ने कहा कि आज हास्य के नाम पर परोसी जा रही फूहड़ता समाज के लिए बेहद घातक और भयावह है।
जब भाषा, संवाद और पारिवारिक रिश्तों की मर्यादा समाप्त होने लगती है, तो यह समाज को सांस्कृतिक तबाही की ओर ले जाती है।
इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि ऐसी अभद्र प्रस्तुतियों पर लोग ठहाके लगाते हैं और तालियां बजाते हैं, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि हमारे विचारों और आदर्शों का स्तर गिरता जा रहा है।
शनिवार को जमशेदपुर में अपने चर्चित हास्य नाटक 'डैड्स गर्लफ्रेंड' के सफल मंचन के सिलसिले में पहुंचे शैलेश लोढ़ा ने एक विशेष बातचीत में स्टैंडअप कॉमेडी, कविता, युवाओं की बदलती जीवनशैली और पठन-पाठन की घटती संस्कृति पर बेबाकी से अपनी राय रखी।
उन्होंने कहा कि कलाकारों को स्वयं यह तय करना होगा कि उनका उद्देश्य केवल तत्कालिक तालियां बटोरना है या समाज को कोई ऐसा सार्थक संदेश देना है जो लंबे समय तक लोगों के दिलों-दिमाग में बना रहे।
कविता पर स्टैंडअप कॉमेडी के बढ़ते असर पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा, "हवाओं के झोंकों से हिमालय नहीं हिलते।"
कविता से मिली पहचान, अभिनय भी सफर का हिस्सा
शैलेश लोढ़ा ने कहा कि उन्होंने कई प्रसिद्ध धारावाहिकों में काम किया है, लेकिन उनकी मूल और वास्तविक पहचान एक कवि की ही है।
कविता ने ही उन्हें राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान दिलाई, जिससे अभिनय की दुनिया के रास्ते खुले। वह 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' में तारक मेहता की भूमिका से घर-घर में लोकप्रिय हुए।
इसके अलावा उन्होंने 'वाह! वाह! क्या बात है', 'वाह भाई वाह' और हाल ही में 'एडवोकेट अंजलि अवस्थी' जैसे शो में अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया।
मोबाइल ने युवाओं को किताबों और इतिहास से किया दूर
युवाओं की बदलती सोच पर गहरी चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी तेजी से डिजिटल माध्यमों की ओर भाग रही है। मोबाइल और सोशल मीडिया ने युवाओं को छपे हुए शब्दों से दूर कर दिया है।
पहले युवा लाइब्रेरी जाते थे, लेकिन आज उनकी दिलचस्पी मोबाइल की फोटो गैलरी तक सीमित होकर रह गई है। पढ़ने की आदत छूटने के कारण युवा देश के समृद्ध इतिहास, उसकी महान यात्रा और वर्तमान तक पहुंचने के संघर्ष को भूलते जा रहे हैं।
उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे देश के अतीत को समझें, किताबों से दोस्ती करें और अपने बजट का कुछ हिस्सा पुस्तकें खरीदने पर भी खर्च करें।
कलम से ही आती हैं क्रांतियां
लोढ़ा ने कहा कि इतिहास गवाह है कि समाज में जब भी कोई बड़ा जागरण या क्रांति हुई है, उसमें लेखकों की कलम की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
उन्होंने युवाओं को सलाह दी कि वे जीवन के अनुभवों से सीखें, पढ़ने की आदत विकसित करें और छपे हुए शब्दों से मोहब्बत करें।
जमशेदपुर से अपने पुराने जुड़ाव को याद करते हुए उन्होंने कहा कि देश के पहले औद्योगिक शहर के रूप में इसकी बहुसांस्कृतिक पहचान और विविधता उन्हें हमेशा से प्रभावित करती रही है।
