जासं, जमशेदपुर : अक्सर हजरत अली के कौल सोशल मीडिया पर आते हैं। ऐसे कौल जो हजरत अली र. के नहीं हैं उन्हें भी उनसे जोड़ दिया जाता है। इस पर मैंने अल्लामा मोमिन बिन हसन शिबलांजी की किताब नूरुल अबसार फी मनाकिब ए आल ए बैतिन नबी अल मुख्तार से हजरत अली के कौल लिख रहे हैं।

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मीठी जबान : हजरत अली ने फरमाया जिसकी जुबान मीठी होती है। उसके दोस्त ज्यादा होते हैं। नेकी की बरकत नेकी और हुस्ने सुलूक के जरिए आजाद शख्स को भी ताबे किया जा सकता है। कलाम : जब अक्ल कामिल होती है तो आदमी गुफ्तगू कम करता है। जो शख्स बेफायदा चीजों को तलब करता है। जरूरी चीजें उससे छूट जाती हैं। गीबत से परहेज : गीबत सुनने वाला भी गीबत करने वालों में से एक है। तकदीर और तदबीर : जब तकदीर का फैसला आ जाता है। तो तदबीर नाकाम हो जाती है। नादान और समझदार की पहचान : बेवकूफ का दिल उसकी जुबान में होता है। अकलमंद की जुबान उसके दिल में होती है। माफी : जब तुम अपने दुश्मन पर काबू पालो। तो उस पर काबू पाने केशुक्र में उसे माफ कर दो। कंजूसी का नुकसान : कंजूस शख्स बहुत जल्द तंगदस्त हो जाता है। वह दुनिया में तो तंगदस्तों की तरह जिंदगी गुजारता है। आखिरत में उससे मालदारों की तरह हिसाब लिया जाएगा। कंजूस तमाम खराबियों का मजमूआ है। आलिम का फायदा और जहालत का नुकसान : इल्म पस्ती में रहने वालों को बुलंदी अता करता है। जहालत बुलंद आदमी को रुसवा कर देती है। हजरत अली ने फरमाया कि तुम उस वक्त तक मालदार नहीं हो सकते जब तक कि तुम पाक दामन ना हो जाओ। गोशानशीनी व तनहाई : तन्हाई राहत है। गोशानशीनी इबादत है। इंसान की पहचान का तरीका : लोगों को तुम इम्तिहान व आजमाइश के जरिए पहचान सकते हो। तो तुम अपने घर वालों और अपनी औलाद को अपनी नामौजूदगी में आजमाओ। अपने दोस्त को अपनी मुसीबत के वक्त आजमाओ। अपने रिश्तेदारों को अपनी फाकाकशी और तंगदस्ती के वक्त आजमाओ। हजरत अली ने इरशाद फरमाया : दुनिया व आखिरत मशरिक व मगरिब की तरह हैं। अगर तुम इनमें से किसी एक के करीब हो जाओगे तो दूसरे से खुद ब खुद दूर हो जाओगे। तमाम इंसान जिस्म के लिहाज से बराबर हैं। उनके वालिद हजरत आदम और वालिदा हजरत हव्वा हैं।

सै. मंजर मोहसिन हुसैनी, पेश इमाम मक्का मस्जिद

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29 का चांद हुआ तो आज अलविदा

अगर ईद का चांद 29 रमजान को नजर आया तो शुक्रवार 15 जून को ईद होगी। तब, आज का जुमा अलविदा जुमा होगा। लेकिन, अगर 30 का चांद होगा तो शनिवार 16 जून को ईद होगी। ऐसी हालत में तब 15 जून को अलविदा जुमा होगा। कई उलेमा आठ जून वाले जुमा को ही अलविदा मान कर चल रहे हैं। मानगो के अरशद हुसैन का कहना है कि अलविदा के दिन रोजेदार फिलिस्तीन के मजलूमों के साथ एकजुटता दिखाते हैं और उनके हक में दुआ करते हैं। इमारत-ए-शरिया के काजी सऊद आलम कासमी कहते हैं कि अलविदा की कोई शरई हैसियत नहीं है। अलविदा को कोई खास नमाज नहीं पढ़ी जाती बल्कि आम तौर से जुमा जैसी ही नमाज पढ़ी जाती है।

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