सरायकेला, प्रमोद सिंह।  Lockdown Effect लॉकडाउन में बेंगलुरु में फंसे अपने इकलौते बेटे के लौटने के इंतजार में बेसहारा बूढ़े मां -बाप की आंखे पथरा गईं हैं। परदेश में बेटा किस हाल में है, कुछ पता नहीं। लॉकडउन के बाद बेटा से एक दिन भी बात नहीं हुई है। कोई हमें बताए किस हाल में है हमारा बेटा। यह कहते हुए दोनों की आंखें नाम हो गईं। जी हां, बात कर रहे हैं सरायकेला-खरसावां जिले के राजनगर प्रखंड क्षेत्र के रोला गांव के बेसहारा बूढ़े मां-बाप की व्यथा की। 

रोला के बाया मुर्मू एवं दुलगु मुर्मू का इकलौता पुत्र ठाकुरा मुर्मू एक साल पहले बेंगलुरु काम करने गया था। लॉकडाउन में वह वहीं फंसा है। परदेश गए गांव के कई लोग लॉकडाउन में वापस लौट आए हैं। परंतु ठाकुरा मुर्मू अभी तक नहीं लौट पाया है। ठाकुरा के माता-पिता घर में अकेले रहते हैं। उन्हें देखभाल करने वाला कोई नहीं है। पिता बाया मुर्मू की उम्र करीब 70 वर्ष है जबकि मां करीब 65 साल की हो चुकी है। पिता अक्सर बीमार रहते हैं। पैर में सूजन है और चलने- फिरने में दिक्कत होती है। डंडे के सहारे चलते हैं। मां भी कहीं मजदूरी करने लायक नहीं है। वह भी बीमार  रहती है। उन्हें पेंशन नहीं मिलता। दोनों बेसहारा पति -पत्नी घर में अकेले ही रहते हैं। घर भी टूटा - फूटा है। बरसात होने पर पानी घर अंदर चुने लगता है।

बेटा कर गया था घर बनवाने का वादा

 पिता बाया मुर्मू ने बताया कि बेटा बोला था कि इस बार पैसा कमाकर आएंगे तो घर को बनवा देंगे। भावुक होते हुए ठाकुरा के माता- पिता ने बताया कि बेटा परदेश में है। कोरोना वायरस बीमारी के चलते गाड़ी बंद है। गांव के लोग आ रहे हैं, लेकिन हमारा बेटा नहीं आया है। हर रोज बेटे के आने की राह देखते रहते हैं। हमलोग बिल्‍कुल बेसहारा अवस्था में हैं। हमारे पास फोन भी नहीं है। बगल के घर में फोन पहले आता था तो बेटे से बातचीत होती थी। परंतु पिछले तीन माह से बात नहीं हुई है। अब पैसा भी नहीं भेज रहा है। हमारी स्थिति काफी दयनीय हो गई है। कोई देखभाल करने वाला नहीं है। बेटे के अलावे कोई सहारा नहीं है। गांव के लोग सुबह -शाम खाना दे देते हैं। जल्द से जल्द किसी तरह बेटा घर लौट आए, भगवान से हमारी यही प्रार्थना है।

Posted By: Rakesh Ranjan

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