जागरण संवाददाता, जमशेदपुर : महात्मा गांधी मेमोरियल (एमजीएम) मेडिकल कॉलेज अस्पताल में करीब तीन करोड़ रुपये की मशीन जंग खा रहीं है। इस मशीन की खासियत यह है कि एक यूनिट खून से तीन रोगियों की जान बचायी जा सकती है। लेकिन लाइसेंस नहीं मिल पाने के कारण उसका उपयोग नहीं हो पा रहा है।

वर्ष 2011 में ब्लड कंपोनेंट मशीन की खरीदारी की गई थी। इसके बाद लाइसेंस लेने के लिए आवेदन किया गया लेकिन अबतक नहीं मिल सका है। करीब आठ साल बीतने को है। जबकि इसकी जांच करने को कई बार दिल्ली व रांची से टीम आई और चली गई। ब्लड कंपोनेंट मशीन शुरू होने से बड़ा फायदा होगा। मात्र एक यूनिट खून से तीन से चार रोगियों की जान बचाई जा सकेगी। मरीजों को निजी अस्पतालों में भी रेफर नहीं करना पड़ेगा और मुफ्त में उपचार हो सकेगा।

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लाइसेंस नहीं मिलने के पीछे कारण

वर्ष 2011 में मशीन के संचालन के लिए ब्लड बैंक में मानक के अनुसार जगह उपलब्ध नहीं थी। कुछ दिनों बाद ब्लड बैंक परिसर में ही इसे इंस्टॉल करने के लिए दो कमरों को मिलाकर जगह बनाई गई लेकिन, 20 अक्टूबर 2011 को भवन का छज्जा क्षतिग्रस्त हो गया। इसकी मरम्मत होने में काफी समय बीत गया। उसके बाद से अबतक मशीन के संचालन के लिए लाइसेंस नहीं मिल सका। फिलहाल जिस रूम में मशीन रखीं गई है उसके सारे एयर कंडीशन (एसी) भी खराब पड़ा हुआ है।

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मरीजों को मिल सकेगा यह कंपोनेंट

खून में मुख्यत चार तरह के कंपोनेंट होते हैं, जिन्हें आवश्यकता अनुसार मरीज को चढ़ाया जाता है। कंपोनेंट में आरबीसी (रेड ब्लड कार्पल), डब्ल्यूबीसी (ह्वाइट ब्लड कार्पल), प्लेटलेट्स और प्लाज्मा शामिल हैं। हीमोग्लोबिन कम होने पर मरीज को आरबीसी, कैंसर मरीज को डब्लूबीसी, डेंगू मरीज को प्लेटलेट्स और जले मरीज को प्लाज्मा चढ़ाया जाता है। ब्लड कंपोनेंट मशीन खून से सभी कंपोनेंट को अलग करती है।

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एमजीएम में बनेगा नया ब्लड बैंक

एमजीएम अस्पताल में नया ब्लड बैंक बनाने की योजना है। जर्जर हालत में पड़े एएनएम स्कूल को तोड़कर उसकी जगह पर नये ब्लड बैंक बनना है। इसका प्रस्ताव विभाग को भेजा गया है।

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लाइसेंस के लिए कई बार आवेदन किया गया पर कई खामियों की वजह से नहीं मिल सका है। इसमें जगह का अभाव के साथ-साथ स्लैब नहीं होना भी शामिल है। सभी कमियों को दूर करने की कोशिश की जा रही है।

- डॉ. नकुल प्रसाद चौधरी, उपाधीक्षक, एमजीएम।

Posted By: Jagran

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