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MGM Hospital की लापरवाही: कागजों से बाहर नहीं निकला जन औषधि केंद्र, 14 साल में सरकारें और अफसर बदले

Published: Mon, 14 Sep 2026 07:00 AM (IST)

जमशेदपुर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में जन औषधि केंद्र की महत्वाकांक्षी योजना पिछले 14 सालों से सरकारी फाइलों और टेंडर प्रक्रिया में फंसी हुई है।

साकची स्थित पुराने एमजीएम अस्पताल परिसर में जन औषधि केंद्र के संचालन के लिए अलग से सेंटर तैयार करने में सरकारी खजाने से लाखों रुपये बहाए गए थे।

साकची स्थित पुराने एमजीएम अस्पताल परिसर में जन औषधि केंद्र के संचालन के लिए अलग से सेंटर तैयार करने में सरकारी खजाने से लाखों रुपये बहाए गए थे।

HighLights

  1. एमजीएम अस्पताल में सस्ती दवाओं का इंतजार जारी।

  2. टेंडर प्रक्रिया में फंसा गरीबों को दवा का लाभ।

अमित तिवारी, जमशेदपुर। कोल्हान के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल महात्मा गांधी मेमोरियल (MGM) मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में गरीब मरीजों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने की महत्वाकांक्षी योजना पिछले 14 सालों से सरकारी फाइलों और टेंडर प्रक्रिया के भंवरजाल में फंसी हुई है। 
 
वर्ष 2012 में साकची स्थित पुराने परिसर में जब जन औषधि केंद्र खोलने की कवायद शुरू हुई थी, तब से लेकर अब तक अस्पताल का पता बदल गया। 
 
500 बेड का नया अत्याधुनिक अस्पताल बनकर तैयार हो गया, लेकिन मरीजों को मिलने वाली सस्ती दवाओं का इंतजार खत्म नहीं हुआ।
 

लाखों रुपये खर्च कर बना भवन, फिर भी नहीं बिकी दवाएं 

साकची स्थित पुराने एमजीएम अस्पताल परिसर में जन औषधि केंद्र के संचालन के लिए अलग से सेंटर तैयार करने में सरकारी खजाने से लाखों रुपये बहाए गए थे। 
 
मंशा साफ थी कि आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को बाजार मूल्य से 50 से 90 प्रतिशत तक कम कीमत पर जरूरी दवाएं मुहैया कराई जा सकें। 
 
हालांकि, विडंबना यह रही कि ढांचागत संरचना और भवन तैयार होने के बावजूद वहां कभी दवाओं की बिक्री शुरू ही नहीं कराई जा सकी और वह भवन धूल फांकता रहा।
 

वीआईपी दौरों और निर्देशों की लगी लंबी फेहरिस्त 

बीते 14 वर्षों में जन औषधि केंद्र को शुरू कराने के लिए कई बार प्रशासनिक हलचल हुई। पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास, स्थानीय सांसद विद्युत वरण महतो, पूर्व स्वास्थ्य मंत्री रामचंद्र चंद्रवंशी और पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता समेत स्वास्थ्य विभाग के शीर्ष अधिकारियों ने निरीक्षण के दौरान केंद्र को जल्द शुरू करने के कड़े निर्देश जारी किए।

प्रशासनिक स्तर पर भी डॉ. नितिन मदन कुलकर्णी, निधि खरे, केके सोन से लेकर वर्तमान स्वास्थ्य सचिव अजय सिंह तक ने इस दिशा में आदेश जारी किए। 
 
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि जब बजट, भवन और शीर्ष अधिकारियों का प्रशासनिक समर्थन मौजूद था, तो यह मूलभूत सुविधा 14 वर्षों तक जमीन पर क्यों नहीं उतर सकी?
 

नया अस्पताल बना, लेकिन टेंडर के फेर में उलझी व्यवस्था 

अब एमजीएम मेडिकल कॉलेज के समीप डिमना में 500 बेड का नया विशाल अस्पताल संचालित होने लगा है। आम जनता को उम्मीद थी कि नए परिसर के साथ ही जन औषधि केंद्र का सपना भी साकार होगा। 
 
परंतु, धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। नए अस्पताल परिसर में भी जन औषधि केंद्र के संचालन की प्रक्रिया केवल 'टेंडर' तक ही सीमित होकर रह गई है।
अस्पताल प्रशासन और संबंधित विभाग के पास इस बात का कोई ठोस जवाब नहीं है कि टेंडर की प्रक्रिया कब पूरी होगी और यह केंद्र कब से काम करना शुरू करेगा। 
 
नतीजतन, कोल्हान भर से इलाज कराने आने वाले हजारों गरीब मरीज आज भी निजी मेडिकल दुकानों से महंगी दवाएं खरीदने को मजबूर हैं।

जन औषधि केंद्र के लिए टेंडर निकाला गया है। उम्मीद है कि जल्द ही केंद्र खुलेगा और मरीजों को सस्ती दरों पर दवाएं उपलब्ध हो सकेंगी।

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डाॅ. बलराम झा, अधीक्षक, एमजीएम