जागरण संवाददाता, जमशेदपुर : देश का सबसे बड़ा कलंक जातिवाद का है। संतों की नजर ने कोई नीची जाति का नहीं होता और न कोई नीचा होता है। मनुष्य अपने प्रारब्ध कर्मवश कहीं दोषी हो जाता है। सबको अपनाना चाहिए क्योंकि भारतीय संस्कृति सिखाती है वसुधैव कुटुंबकम। समाज में तभी समानता आएगी जब सब बराबर के होंगे और सबकी भावना में आदर का भाव होगा।

तुलसी भवन में आर्ट ऑफ लिविंग के तत्वावधान में आयोजित भागवत कथा के दूसरे दिन बुधवार को व्यासपीठ से कथावाचक स्वामी दिव्यानंद ने कहा कि भगवत सत्य को स्वीकारने का साम‌र्थ्य देती है। मोह से विरक्त करती है और भीतर में व्याप्त मोह रूपी बीमारी के लिए औषधि का काम करती है। मृत्यु से परे जाने का सूत्र श्रीमद्भागवत से ही मिलता है। भगवत प्रेम, समाधि का भाषा का चित्रण है।

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ईश्वर नेत्रों से संवाद आरंभ करते हैं

भक्ति के सूत्र की चर्चा करते हुए स्वामी दिव्यानंद ने बताया कि भक्त जब भगवान से संवाद की स्थिति में आता है, तब स्वयं भगवान अपने नेत्रों से संवाद करते हैं। क्योंकि, भगवान और गुरु दोनों हो बोलते कम हैं। इस संवाद को भक्ति के चरम पर आने से ही समझा जा सकता है।

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सुदर्शन क्रिया लाभकारी

स्वामी दिव्यानंद ने बताया कि सुदर्शन क्रिया से व्यक्ति स्वयं का पुनर्जन्म महसूस करता है। इसे करने से स्वयं में परिवर्तन महसूस होता है। सुदर्शन क्रिया परमात्मा की ओर जाने का प्रथम सोपान है। यहां से समर्पण और अर्पण का मार्ग प्रशस्त होता है। अत: हर जीव को इस क्रिया का अभ्यास करना चाहिए।

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सरकार के भरोसे कुछ नहीं होगा

स्वामी दिव्यानंद ने कहा कि विकास और समानता का कार्य केवल सरकार के भरोसे नहीं हो सकता। सबको मिलकर सामूहिक प्रयास करना होगा क्योंकि देश हम सबका है और समाज हम सभी के संयुक्त का प्रतिफल है। जाति या वर्ण के आधार पर किसी को वंचित नहीं किया जा सकता है।

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गुरुवार की कथा

गुरुवार को कथा में जड़भरत संवाद और नरसिंह अवतार प्रसंग पर चर्चा होगी।

Posted By: Jagran

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