जमशेदपुर(जासं)। हार्ट की तरह अब ब्रेन में भी पेस मेकर लगाकर पार्किसन मरीजों की जान बचायी जा रही है। ये बातें रविवार को कोलकाता के न्यूरो सर्जन डॉ. ऋषिकेश कुमार ने कहीं। मौका था नेशनल हाइवे-33 स्थित होटल में आयोजित झारखंड न्यूरोसाइंस सोसाइटी का तीन दिवसीय वार्षिक सेमिनार का समापन का।

इस मौके पर डॉ. ऋषिकेश कुमार ने कहा कि पार्किसन दिमाग से जुड़ी बीमारी है। लोग, अक्सर इसे बुढ़ापा की बीमारी समझ लेते है, लेकिन ऐसा नहीं है। दवा के माध्यम से इलाज संभव है। अभी नई चिकित्सा विधि विकसित हुई है। हार्ट की तरह ब्रेन में भी पेसमेकर लगाकर मरीजों का इलाज किया जा रहा है। पार्किसन बीमारी एक लाख लोगों में 150 को होता है। इसका पहचान करना आसान नहीं है। इसके लिए कोई भी प्रयोगशाला परीक्षण नहीं होते। आमतौर पर डॉक्टर इसके लक्षण और रोगी की हालत देखकर ही इस रोग के बारे में बताते है।

बीमारी का लक्षण शारीरिक गतिविधि में सुस्ती महसूस करना, शरीर को संतुलित करने में दिक्कत महसूस करना, शरीर को संतुलित करने में दिक्कत महसूस करना, हंसने और पलके झपकाने में दिक्कत महसूस करना, बोलने की समस्या और लिखने में दिक्कत महसूस करना, हाथों, भुजाओं, पैरों, जबड़ों और मांसपेशियों में अकड़न होना सहित अन्य शामिल है। ऐसे पीड़ित लोगों में डिप्रेशन, अनिद्रा, चबाने, निगलने या बोलने जैसी समस्याएं भी पैदा हो सकती है। इस अवसर पर डॉ. एमएन सिंह, डॉ. एस राउल, डॉ. अजय कुमार, डॉ. संजय कुमार सहित सैकड़ों डॉक्टर उपस्थित थे।

26 डॉक्टरों ने प्रस्तुत किए पेपर : कार्यक्रम में देशभर से आए कुल 26 डॉक्टरों ने पेपर प्रस्तुत किया। इसमें कोलकाता के डॉ. अप्रतिम चटर्जी को डॉ. बीसी राय अवार्ड दिया गया। इसके साथ ही डॉ. दिलीप राय, डॉ. श्रीकांत दास, डॉ. विराट हर्ष, डॉ. देव दत्ता, डॉ. गौतम दत्ता, डॉ. निशांत गुप्ता सहित अन्य को सम्मानित किया गया। तेजी से बढ़ रही ब्रेन की बीमारी : डॉ. ऋषिकेश ने बताया कि ब्रेन की बीमारी तेजी से बढ़ रही है। इसका मुख्य कारण भागदौड़ की जिंदगी है। न तो पूरी नींद हो पा रही है और न ही सही खान-पान। बीते पंद्रह साल में स्ट्रोक के मरीजों में दोगुना इजाफा हुआ है। जीवनशैली में सुधार करने की जरूरत है।

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