मुसाबनी (पूर्वी सिंहभूम) [मुरारी प्रसाद सिंह] । पहाड़ी गांवों में अफीम की फसल लहलहाती है। करोड़ों की खेती होती है। लेकिन खेती करनेवालों का किसी को पता नहीं होता। झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के फारेस्ट ब्लॉक पंचायत की दुर्गम पहाड़ी पर स्थित बोंडोपोल और नाकटी गांव में अफीम की खेती की सूचना पर उसे नष्ट किया गया, लेकिन पुलिस के समक्ष यह यक्ष प्रश्न मुंह बाए खड़ा है कि खेती आखिर कर कौन रहा था।

बुधवार को मुसाबनी और जादूगोड़ा पुलिस ने संयुक्त रूप से कार्यपालक दंडाधिकारी देवेंद्र कुमार दास के नेतृत्व में लगभग पांच एकड़ वन भूमि पर अफीम (पोस्तु) की खेती को कर नष्ट किया। अफीम की फसल तैयार हो जाती तो इसका बाजार में अनुमानित मूल्य करोड़ो में होता। गुप्त सूचना के आधार पर छापामारी की गई। बोंडापोल और नाकटी गांव के पहाड़ी क्षेत्र की वन भूमि अफीम (पोस्तु) की खेती की जा रही थी। जिसकी भनक तक किसी को लगने नहीं दी गई।

फूल लगने हो गए थे शुरू

दोनों गांव पहाड़ पर हैं। जहां पहुंचना भी काफी कठिन था। दोनों गांव तक गाड़ी ले जाकर पहुंचना तो और भी कठिन है। इसी कारण उक्त स्थल को अफीम की खेती के लिए चुना गया था। यह मुसाबनी थाना से लगभग 15 से 16 किलोमीटर दूरी पर है। अफीम में अभी फूल लगने शुरू हो गए थे। अफीम खेती के संबंध में और एक महीने तक पुलिस को सूचना नहीं मिलती तो यह तैयार कर ली जाती।

जमीन वन विभाग की 

बीडीओ संतोष गुप्ता ने बताया कि गांव के ग्रामीण कुछ भी बताने को तैयार नहीं हैं कि अफीम की खेती किसके इशारे पर हो रही है। अफीम खेती वन विभाग की भूमि पर की जा रही थी। जिससे किसी पर आरोप भी तय नहीं किया जा सकता है। लेकिन पुलिस इसकी सघन जांच में जुटी है कि कौन खेती कर रहा था। ग्रामीणों का कहना था कि जो लोग खेती करवा रहे थे, वह बाहर से आते थे। यहां के लोग उनके बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं। पुलिस के आने की सूचना मिलने के कारण बोंडोपोल में अफीम की खेती को नष्ट कर दिया गया था। नाकटी में भी खेती की जानकारी मिली और वहां जाकर भी पुलिस बल ने फसल को नष्ट कर दिया है। 

मुसाबनी क्षेत्र में बढ़ रहा है अफीम का कारोबार

एक किलो अफीम की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में लाखों की है। सुदूर ग्रामीण इलाकों में उगाए जानेवाले अफीम के कारोबार में दिन प्रतिदिन वृद्धि होती जा रही है। दरअसल, काला सोना यानी अफीम की खेती के लिए झारखंड की मिट्टी और जलवायु काफी मुफीद है। जिसकी वजह से हजारों एकड़ जमीन पर इसकी खेती की जा रही है।पहले इसके पीछे नक्सली हुआ करते थे लेकिन अब आम ग्रामीण भी इससे होने वाली मोटी कमाई की वजह से इसकी खेती से जुड़ गए हैं।

राजधानी से 40 किलोमीटर दूर भी खेती

कभी सूबे के सुदूर ग्रामीण इलाकों में उगाया जानेवाला अफीम अब शहरों के पास तक पहुंच गया है। हाल ही में रांची से महज 40 किलोमीटर की दूरी पर अफीम की अवैध खेती पाई गयी थी। वहीं, इस साल झारखंड के खूंटी, चतरा, लातेहार, लोहरदगा, गुमला, सिमडेगा, गढ़वा और हजारीबाग जिलों में सुरक्षाबलों ने अभियान चलाकर अबतक सैकड़ों एकड़ में लगी अफीम की फसल को नष्ट किया गया है। 

पुलिस की दबिश से नहीं पड़ रहा फर्क

मोटी कमाई की वजह से पुलिस की दबिश के बाबजूद साल दर साल इसकी खेती में इजाफा हो रहा है। बढ़ती अफीम की खेती की समस्या से निपटने के लिए पुलिस एवं प्रशासन द्वारा बराबर धरपकड़ अभियान चलाया जाता है लेकिन या रुकने का नाम नहीं ले रहा। जाड़े का मौसम खेती के लिए काफी मुफीद माना जाता है। इस दौरान एक से दो महीने के भीतर अफीम में फल व फूल आने लगते हैं। सबसे खतरनाक तथ्य यह है कि ग्रामीण किसान भी कमाई के लालच में लगातार इससे जुड़ रहे हैं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पुलिस इसकी फसल नष्ट करने के लिए लगातार अभियान चला रही है।

Posted By: Rakesh Ranjan

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