जमशेदपुर, जेएनएन। जेआरडी टाटा का योगदान सिर्फ जमशेदपुर शहर तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इस देश को भी उन्होंने बहुत कुछ दिया है। आज इसी महान शख्सियत का जन्‍मदिन है। जमशेदपुर शहर की ही बात की जाए तो यहां का कण-कण उनसे जुड़ा है। जेआरडी टाटा सिर्फ एक बिजनेसमैन ही नहीं थे बल्कि इससे कहीं आगे थे। वह लोगों की परेशानियों को करीब से समझते और उन्हें दूर करने वालों में से एक थे। यही वजह है कि आज भी टाटा का नाम भारत में बेहद इज्जत के साथ लिया जाता है। पेश हैं उनसे जुड़े कुछ रोचक और प्रेरक किस्से।

काम वह करना चाहिए जिसमें देश का हित हो
जेआरडी टाटा का विचार था कि टाटा को वह काम करना चाहिए जिसमें देश का हित हो। इसलिए उन्होंने कभी इस बात की ओर ध्यान नही दिया कि जिस उत्पादन में कंपनी को अधिक लाभ हो उसी की ओर अधिक ध्यान लगाया जाए, वरन उनका कहना था कि जिस उत्पादन की भारत को अधिक आवश्यकता है उधर ध्यान देना चाहिए। जेआरडी अमेरिका के इस्पात उद्योग में शिरोमणि एंड्रयू कारगेनी की तरह सोचते रहे कि जिस व्यक्ति के पास धन है उसे सीधे साधे ढंग से बिना दिखावे के रहना चाहिए। कारगेनी का कहना था कि धनी व्यक्ति को अपनी कमाई लोगों में बांटनी चाहिए। उनके काम करने का ढंग यह था कि वे एकबार निर्णय लेने पर काम पूरा करने का दायित्व दूसरों पर छोड़ देते थे। तबतक हस्तक्षेप नहीं करते थे जबतक कि वह भूल न करने लगे। .

.और मा सुजाने इस तरह बन गईं सूनी
रतनजी दादाभाई टाटा यानी आरडी टाटा को फ्रेंच भाषा सीखने का शौक था। फ्रेंच पढ़ाने वाले अध्यापक के घर में ही उनकी भेंट एक फ्रेंच युवती से हुई। यह 20 वर्ष की छरहरे बदन की लंबी, सुनहरे बालों व नीली आंखों वाली थी। उसका नाम सुजाने था। आरडी टाटा ने विवाह कर नाम सूनी रख दिया। सूनी का पारसी में अर्थ होता है सोने से बनी हुई। आरडी टाटा और सुनी से 29 जुलाई 1904 को जेआरडी टाटा का जन्म हुआ। उस समय पिता आरडी टाटा पेरिस के प्रसिद्ध एफील टावर से कुछ दूर अपना मकान बना चुके थे।

उनके कानों में गूंज रहा था कार्लाइल का भाषण
जेआरडी टाटा ने जमशेदपुर के इस्पात कारखाने में काम शुरू किया तो उनके कानों में कार्लाइल का भाषण गूंज रहा था 'जिस राष्ट्र के पास इस्पात होगा उसी के पास सोना रहेगा'। जेआरडी जमशेदपुर पहुंचे तो यह एक विशाल नगर के रूप में बस चुका था। जिन दिनों जेआरडी जमशेदपुर में इस्पात कारखाने के विभिन्न विभागों के काम का प्रशिक्षण ले रहे थे उन्हीं दिनों उनके पिता रतनजी दादाभाई टाटा यानी आरडी टाटा की फ्रांस में मृत्यु हो गई। जेआरडी अंतिम समय में वहां नहीं पहुंच सके थे।

 

मुझे जोखिम उठाना पसंद है
पिता के देहांंत के समय कंपनी पर काफी कर्ज था। उन पर चार भाई बहनों की देखभाल का आर्थिक बोझ भी आ पड़ा। अभी तक जिस युवक पर कोई दायित्व न रहा था अचानक सब कुछ बदल जाने पर 22 वर्ष की आयु में ही वह एक प्रबुद्ध और अनुभवी व्यक्ति के रूप में बदल गया। जेआर डी ने यह स्वीकार किया कि मुझे जोखिम उठाना पसंद है। उनका यह स्वभाव इस स्थिति में काम आया और उन्होंने स्थिति को देखते हुए कंपनी से केवल 750 रुपये प्रतिमाह वेतन लेना स्वीकार किया, जबकि उनके पिता तीन लाख रुपये प्रतिवर्ष कंपनी से लेते थे। उनके लिए तीन हजार प्रति माह वेतन तय कर गए थे, परन्तु उन्होंने कर्जे को देखकर ऐसा नहीं किया।

संयत स्वभाव के कारण ही मिली कामयाबी
जेआरडी टाटा का कहना था कि एक विमान चालक में तुंरत निर्णय लेने की योग्यता होनी चाहिए। उसके हाथ घुड़सवार की तरह स्थिर होने चाहिए। सही निर्णय के साथ उसका स्वभाव संयत भी होना चाहिए। संभवत: अपने इन्हीं गुणों के कारण जेआरडी टाटा को इतने विशाल औद्योगिक उपक्रम में प्रबंधन चलाने में सहायता मिली।

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