Track पर देश का नाम रोशन करने वाली आदिवासी धाविका की अनदेखी, मैराथन में Gold जीतने के बाद भी परिवार चलाना मुश्किल
बलरामपुर की आदिवासी धाविका पिंकी हांसदा, जिन्होंने ट्रैक पर देश का नाम रोशन किया, आज आर्थिक तंगी से जूझ रही ...और पढ़ें

राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में दर्जनों मेडल अपने नाम करने के बावजूद पिंकी आज भी स्थायी सरकारी नौकरी की आस में संघर्ष कर रही हैं।
HighLights
पिंकी हांसदा ने राष्ट्रीय स्तर पर कई स्वर्ण पदक जीते।
आदिवासी धाविका आज आर्थिक तंगी और बेरोजगारी से जूझ रही हैं।
नई सरकार से स्थायी सरकारी नौकरी की उम्मीद लगाए बैठी हैं।
संसू, बलरामपुर। कभी ट्रैक पर अपनी तेज रफ्तार और रिकॉर्ड प्रदर्शन से राज्य व देश का नाम रोशन करने वाली बलरामपुर की आदिवासी बेटी पिंकी हांसदा आज आर्थिक तंगी से गुजर रही हैं।
विभिन्न दौड़ और मैराथन प्रतियोगिताओं में देश व प्रदेश के लिए स्वर्ण पदक जीतने वाली इस आदिवासी खिलाड़ी की सरकार ने अनदेखी की है।
जिला से लेकर राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में दर्जनों मेडल अपने नाम करने के बावजूद 35 वर्षीय पिंकी आज भी स्थायी सरकारी नौकरी की आस में संघर्ष कर रही हैं।
स्कूली जीवन से शुरू हुआ पदकों का सफर
बलरामपुर प्रखंड के कदामडी गांव की रहने वाली पिंकी हांसदा ने अपने स्कूली जीवन से ही दौड़ना शुरू किया था। वर्ष 2017 से 2019 के बीच उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की कई प्रतियोगिताओं में प्रतिभा का परचम लहराया।
वर्ष 2018 में असम में आयोजित 3,000 मीटर दौड़ तथा 14 किलोमीटर मैराथन में पिंकी ने पहला स्थान हासिल कर स्वर्ण पदक जीता था।
इसके अलावा महाराष्ट्र के पुणे में आयोजित राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भी वे प्रथम स्थान पर रहीं। वर्ष 2017 में टाटा स्टील जमशेदपुर मैराथन की सात किलोमीटर दौड़ में उन्होंने कांस्य पदक जीता था।
डिग्री और आरक्षण के बाद भी रोजगार से वंचित
बलरामपुर कॉलेज से स्नातक (ग्रेजुएशन) कर चुकीं पिंकी वर्तमान में बनबांधा-तेंतुलडी गांव में अपने पति और दो छोटे बच्चों के साथ रहती हैं।
उनके पति की सीमित खेती की आय से पूरे परिवार का पेट पालना बेहद मुश्किल हो रहा है। पिंकी का दर्द है कि अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण और खेल कोटे की बेहतरीन उपलब्धियों के बावजूद उन्हें रोजगार के अवसरों से वंचित रखा गया है।
वादे रहे अधूरे, अब नई सरकार से उम्मीद
पिंकी हांसदा का आरोप है कि पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों से केवल आश्वासन ही मिले। नौकरी के लिए उन्होंने बार-बार प्रशासनिक कार्यालयों के चक्कर काटे, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई।
अब राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद पिंकी ने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से गुहार लगाते हुए सरकारी नौकरी की मांग की है। पिंकी का कहना है कि यदि उन्हें नौकरी या रोजगार का अवसर मिलता है, तो वे अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित कर सकेंगी।
साथ ही, गांव के गरीब और प्रतिभावान बच्चों को एथलेटिक्स की मुफ्त ट्रेनिंग देकर देश के लिए नए खिलाड़ी तैयार करने का अपना सपना भी पूरा करेंगी।
