जमशेदपुर (जागरण संवाददाता)। मां आई, नौ दिनों तक साथ रहीं और चली गई। विजयादशमी के दिन कलश विसर्जित होने के वक्त कई भक्तों की पलकें गीली हो गई, कई फफक कर रो पड़े। जिन्होंने मां को वाह्य दृष्टि से देखा, उन्होंने नाच गाकर मां को विदा किया।

शंख घंटा, घड़ियाल, शहनाई व ढाक बजाए, गुलाल उड़ाया और मां को विसर्जित कर लौट आए। विजयादशमी के दिन मंगलवार को परंपरागत ढंग से मूर्तियों का विसर्जन हुआ। बंगलाभाषियों ने 'आबार एशो मां' की कारुणिक पुकार के साथ मां दुर्गा को विदाई दी। भाव विहल महिलाएं एक दूसरे को 'आसते बोछोर आबार होबे' कहकर सांत्वना देती रहीं। विभिन्न पूजा समितियों के लोग ट्रकों में प्रतिमाएं लेकर साकची चौक पहुंचने लगे। देर रात तक विसर्जन जुलूस गुजरने का क्रम जारी रहा, जबकि नदी घाटों पर विसर्जन कार्यक्रम संपन्न होते-होते आधी रात हो गई।

सिंदूर खेला विजयादशमी के दिन पूजा पंडालों मे

¨सदूर-खेला' की रस्म हेतु श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रही। पंडालों में '¨सदूर-खेला' के दौरान महिलाओं ने मां की पूजा-अर्चना के पश्चात एक दूसरे को ¨सदूर लगाया एवं बधाई दी। पुरुष भी हमउम्रों के गले मिलकर एवं बड़े बुजुगों के चरण स्पर्श कर शुभकामनाएं एवं आशीर्वाद बटोरते दिखे। -- सुख शांति की कामना महिलाओं ने मां की विदाई पूजा के साथ अपने परिवार और समाज के लिए सुख व शांति की कामना की। बंगाली समाज ने परंपरागत तरीके से मां की ¨सदूर से पूजा कर उनसे आशीर्वाद मांगा। महिलाओं ने कहा कि आज उनके लिए आनंद उत्सव का दिन है। शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा अपनी ससुराल से मायके आती हैं। मां मायके में नौ दिनों तक रहने के बाद मंगलवार को अपने घर वापस चली गई। साथ ही उन्होने मां से ठीक इसी प्रकार अगले साल भी आने का आग्राह किया।

सुहाग की लंबी आयु की कामना

विर्सजन से पूर्व सुहागिन महिलाओं ने परंपरा के अनुसार ¨सदूर की होली खेलकर मां से अपने सुहाग की लंबी आयु की कामना की। महिलाओं ने ¨सदूर पहले मां दुर्गा की मांग में लगाने के बाद उनके सभी उगलियों में लगाया। इसके बाद उस ¨सदूर को मां के चरण में रख कर उससे थोड़ा हिस्सा निकालकर अपने ¨सदूर वाले पात्र में रखा। उसी ¨सदूर को महिलाओं ने एक दूसरे की मांग में लगाया। जिससे उनका सुहाग सलामत रहे। उसके बाद उसी ¨सदूर को महिलाओं ने एक दूसरे के गालों पर लगा कर ¨सदूर की होली खेली।

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