जमशेदपुर, जागरण संवाददाता। कथा साहित्य में जयनंदन का देश-विदेश में बड़ा नाम है। टाटा स्टील के कारपाेरेट कम्युनिकेशन विभाग से सेवानिवृत्त जयनंदन का आठवां उपन्यास ‘चिमनियों से लहू की गंध’ इसी माह प्रकाशित हुआ है, जिस पर बीबीसी की पूर्व उद्घोषक अचला शर्मा ने जयनंदन का साक्षात्कार भी लिया है। नवादा (बिहार) के मिलकी गांव में जन्मे जयनंदन ने टाटा स्टील में मजदूर के रूप में नौकरी की शुरुआत की थी, इसके बावजूद इन्होंने हिंदी में ना केवल एमए किया, बल्कि उस समय से हिंदी की सेवा कर रहे हैं।

पहली कहानी आगरा की एक पत्रिका ‘युवक’ में 1981 में छपी, तो दो साल बाद बहुप्रतिष्ठित पत्रिका सारिका में आई। इसके बाद तो धर्मयुग, रविवार, गंगा, कादम्बिनी, सारिका, हंस, पहल, वर्तमान साहित्य, इंद्रप्रस्थ भारती, समकालीन भारतीय साहित्य, इंडिया टुडे, आउटलुक, शुक्रवार, कथादेश, सबरंग, अक्षरा, अक्षरपर्व, आजकल, कथाबिंब, कथाक्रम, पलप्रतिपल, पश्यंती, हिमप्रस्थ, संबोधन, आधारशिला, नवनीत, निकट, मित्र, नया ज्ञानोदय, वसुधा, अन्यथा, वागर्थ, पाखी, बहुवचन, किस्सा, मधुमती, मंतव्य, माटी आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगभग 150 कहानियां प्रकाशित हुईं। इनके लिखे नाटकों का दिल्ली, देहरादून, इलाहाबाद, पटना, रांची, नागपुर, जमशेदपुर आदि शहरों में कई-कई बार मंचन हुआ। आकाशवाणी और दूरदर्शन के कई चैनलों पर नाटक और कहानी के टीवी रूपांतरणों का प्रसारण हुआा।

कुल 35 पुस्तकें प्रकाशित

जयनंदन की अब तक कुल 35 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, जिसमें ‘श्रम एव जयते’, ‘ऐसी नगरिया में केहि विधि रहना’, ‘सल्तनत को सुनो गांववालो’, ‘विघटन’, ‘चौधराहट’, ‘मिल्कियत की बागडोर’, ‘रहमतों की बारिश’, ‘चिमनियों से लहू की गंध’ (उपन्यास), ‘सन्नाटा भंग’, ‘विश्व बाजार का ऊंट’, ‘एक अकेले गान्ही जी’, ‘कस्तूरी पहचानो वत्स’, ‘दाल नहीं गलेगी अब’, ‘घर फूंक तमाशा’, ‘सूखते स्रोत’, ‘गुहार’, ‘गांव की सिसकियां’, ‘भितरघात’, ‘मेरी प्रिय कथायें’, ‘मेरी प्रिय कहानियां’, ‘सेराज बैंड बाजा’, ‘संकलित कहानियां’, चुनी हुई कहानियां’, ‘गोड़पोछना’, ‘चुनिंदा कहानियाँ’, ‘निमुंहा गाँव’, ‘आईएसओ 9000’, ‘मायावी क्षितिज’ व ‘मंत्री क्या बने, लाट हो गये’ आदि कहानी संग्रह समेत तीन नाटक हैं। इनकी कहानियों का अंग्रेजी, स्पैनिश, फ्रेंच, जर्मन, नेपाली, तेलुगु, मलयालम, तमिल, गुजराती, उर्दू, पंजाबी, मराठी, उड़िया, मगही आदि भाषाओं में अनुवाद हुआ है, जबकि कुछ कहानियों पर रांची वि.वि., राजर्षि टंडन मु.वि.वि., मगध वि.वि., कोल्हापुर आदि से शोधार्थियों को पीएचडी की डिग्री भी मिली। इन्हें कृष्ण प्रताप स्मृति कहानी प्रतियोगिता (वर्तमान साहित्य), कथा भाषा प्रतियोगिता तथा कादम्बिनी अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में कई बार कई कहानियां पुरस्कृत हुईं। इन्होंने 20 वर्ष तक टाटा स्टील की गृह पत्रिका का संपादन किया।

Edited By: Rakesh Ranjan