जमशेदपुर, वीरेंद्र ओझा। झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिला के धालभूमगढ़ प्रखंड का एक बड़ा इलाका बंजर पड़ा था। बारिश में पहाड़ और जंगल से पानी आता था, लेकिन वह यहां के ग्रामीणों के लिए मृगतृष्णा जैसी थी। पहाड़ी के नीचे पड़ने वाले पहले गांव का नाम सरगोछिड़ा (स्वर्गशिरा का अपभ्रंश) है, लेकिन जल के अभाव में जिंदगी नर्क के समान थी। अब यह इलाका सचमुच अपने नाम को सार्थक करता हुआ दिख रहा है।

महज दो वर्ष में 5325 एकड़ बंजर जमीन पर हरियाली फैल चुकी है, जबकि लक्ष्य 13,782 एकड़ क्षेत्रफल को हरा-भरा करना है। असंभव सा दिखने वाला यह काम स्वयंसेवी संस्था कला मंदिर ने ग्रामीणों के सहयोग से किया। इसमें वित्तीय सहयोग नाबार्ड और निगरानी झारखंड राज्य जलछाजन प्रबंधन कार्यक्रम कर रही है। कला मंदिर के प्रमुख (प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन) विश्वरूप चटर्जी बताते हैं कि इस स्थल का चयन झारखंड सरकार ने किया था। सरकारी प्रक्रिया के बाद वर्ष 2016-17 में यह प्रोजेक्ट हमें मिला। इससे पहले यहां घास तक नहीं उगती थी, क्योंकि बारिश का पानी रुकता ही नहीं था। उसी वर्ष हमने ढलान वाली जमीन पर नेकलेस की तरह एक फुट गहरे और छह फुट लंबे ट्रेंच खोदे। इसके बाद निचली जमीन पर तीन-तीन फुट गहरे ट्रेंच बनाए। एक ग्रामीण ने अपनी जमीन पर तालाब खोदने के लिए दे दी, जबकि शुरुआती चरण में यह शामिल नहीं था।

बारिश से इलाके की मिट्टी में आइ नमी

धालभूमगढ़ प्रखंड के झारपोखरा गांव में तालाब के किनारे मुनगा (सहजन) का तना लगाती महिला।

बहरहाल, वर्ष 2018 में जब बारिश हुई, तो ना केवल तालाब भर गया, बल्कि इस इलाके की मिट्टी में नमी आ गई। नतीजा देखकर दूसरे वर्ष करीब 35 गांव के ग्रामीण तालाब खोदने का आग्रह करने लगे, जिसके बाद हर गांव में एक-दो करके 45 तालाब खोद दिए गए। इस बीच ट्रेंच का काम चलता रहा। आज यहां के ग्रामीण धान की खेती के अलावा सब्जी, अरहर दाल, सरसों, ओल समेत तमाम फसल उगाने लगे। तालाब में मछली और बत्तख पाल रहे हैं, जो इनके लिए सपना था। पांच साल के लिए बने इस प्रोजेक्ट की अवधि मार्च 2022 में समाप्त हो जाएगी। पूरा प्रोजेक्ट करीब 11.5 करोड़ रुपये का है। तालाब के किनारे लगे महोगनी के पेड़

ऐसे खोदा गया ट्रेंच।

धालभूमगढ़ इलाके में हर तालाब के किनारे कला मंदिर ने अपनी ओर से महोगनी (इमारती लकड़ी के पौधे) लगाए थे, जिनमें अधिकतर बड़े हो रहे हैं। तालाब में साल भर पानी रहने से अब लोग खुद इसके किनारे सहजन-मुनगा के तने लगा रहे हैं। ओल की खेती कर रहे हैं। इससे पहले यहां के लोग जंगल की लकड़ी-पत्ते बेचकर गुजारा करते थे या दिहाड़ी मजदूरी के लिए शहर जाते थे। बंजर जमीन होने की वजह से कई गांव में आबादी ही नहीं थी, लेकिन अब वहां घर बनाने की सोच रहे हैं।

कला मंदिर के हेड (नेचुरल रिसोर्स मैनेजमेंट) विश्वरूप चटर्जी।

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