यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 01, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
Jamshedpur News : पूर्व मंत्री यदुनाथ बास्के का निधन, पैदल और साइकिल से प्रचार कर जीतें थे चुनाव
Former minister Yadunath Baske News घाटशिला के गोपालपुर स्वर्णरेखा नर्सिंग होम में पूर्व मंत्री यदुनाथ बास्के का इलाज चल रहा ...और पढ़ें

घाटशिला : बिहार सरकार के पूर्व मंत्री यदुनाथ बास्के की तबीयत अचानक बिगड़ गई है। बुधवार दोपहर इलाज के दौरान उनका निधन हो गया। घाटशिला के गोपालपुर स्वर्णरेखा नर्सिंग होम में पूर्व मंत्री यदुनाथ बास्के का इलाज चल रहा था। पिछले लगभग एक सप्ताह से भर्ती थे।
घर का धान बेचकर मात्र सात हजार में विधायक बन गए थे यदुनाथ बास्के
आज के हाईटेक चुनाव प्रचार एवं लाखों खर्च करने के बावजूद प्रत्याशी विधायक एवं सांसद का चुनाव जीत नहीं पाते चुनाव में पैसे का जोर चलता है। लेकिन इससे इतर एक दौर था जब कुछ चंद रुपए खर्च कर प्रत्याशी विधायक बन जाते थे। इन्हीं में एक थे यदुनाथ बाबू।
पूर्वी सिंहभूम जिला के मुसाबनी प्रखंड के रंगामटिया की माटी में रचे बसे 95 वर्षीय यदुनाथ बास्के एक ऐसे शख्सियत थे। जिन्होंने आजादी की लड़ाई से लेकर झारखंड आंदोलन तक में अपनी अहम भूमिका अदा की। पूर्व मंत्री और झारखंड आंदोलनकारी रहे यदुनाथ बास्के की पहचान उनकी सादगी और सफेद धोती कुर्ता है। 7 जनवरी 1928 को इनका जन्म हुआ था। शुरू से ही राजनीति में ये सक्रिय रहे ।पहली बार 1952 में अपने मताधिकार का इन्होंने प्रयोग किया था। जब उनसे पूछा गया था कि किस पार्टी को वोट दिए थे, उन्होंने कहा था अरे वह सब याद नहीं है। शेर छाप था। एमएलए का चुनाव था। उसी को वोट दिए थे। यदुनाथ बास्के 1969 में झारखंड पार्टी के टिकट पर घाटशिला के विधायक बने थे। 1971 में कर्पूरी ठाकुर के मंत्रिमंडल में महज चार माह के लिए उन्हें जनजातीय कल्याण मंत्री स्वतंत्र प्रभार बनाया गया था।
मुर्गा चुनाव चिन्ह से चुनाव जीते थे चुनाव
यदुनाथ बास्के झारखंड पार्टी से मुर्गा चुनाव चिंह से चुनाव जीते थे ।इस चुनाव चिन्ह में मात्र सात हजार खर्च हुए थे। जब वे स्वस्थ थे तो उन्होंने इस बात की जानकारी देते हुए बताया था कि विधायक का चुनाव लड़ने के लिए उनके पास पैसा नहीं था। घर का धान बेचकर नामांकन किया। उस वक्त के चुनाव और आज के चुनाव में बहुत अंतर है। आज के चुनाव में धनबल और बाहुबल का जोर चलता है।
उस समय हम लोग गांव में पैदल और साइकिल से घूम-घूम कर चुनाव का प्रचार करते थे। चुनाव में लोग पैसा नहीं लेते थे। मतदाता और बूथ पर बैठने वाले लोगों को भी पैसा नहीं चाहिए था, बल्कि गांव में जाने पर प्रत्याशी की ग्रामीण मदद करते थे। प्रचार में जाने वाले लोगों को गांव के लोग ही खाना खिलाते थे। रात में ठहरने के लिए व्यवस्था करते थे ।उस समय एक एक सप्ताह तक हमलोग घर नहीं आते थे। हम लोग गांव दर गांव घूम कर रात गुजारते हुए प्रचार करते थे। आज का चुनाव तो खर्चीला हो गया है। हर जगह पैसा चाहिए ।जब विधायक बना था तो शायद 300 या 400 रुपया उन्हें मिलता था। अभी 55 से 60 हज़ार पेंशन मिलता है। खैर आज का चुनाव बहुत खर्चीला व झंझट वाला है। हमें लोग के समय का चुनाव बहुत अच्छा था। उस समय मतदाता भी अपने मन से मताधिकार का प्रयोग करते थे। उन पर धनबल और बाहुबल हावी नहीं होता था।
