जमशेदपुर, वीरेंद्र ओझा। दिवंगत फिल्म निर्देशक जे. ओमप्रकाश भले ही मुंबई निवासी के रूप में जाने जाते रहे, लेकिन झारखंड के जमशेदपुर से उनका गहरा नाता है। ओमप्रकाश के दो छोटे भाई सुभाषचंद्र व राजेश चंद्र अब भी जमशेदपुर के सोनारी में रहते हैं।

दोनों टाटा मोटर्स के सेवानिवृत्त कर्मचारी थे, जबकि जे. ओमप्रकाश के पिता जगतराम बिष्टुपुर के गरमनाला स्थित दयानंद आर्य वैदिक उच्च विद्यालय (आर्य समाज स्कूल) में आजीवन शिक्षक रहे। यहां  1982 में उनका निधन हो गया था। इनका परिवार भारत विभाजन के दौरान उपजी स्थितियों के बाद जालंधर से यहां आकर बसा था, लेकिन ओमप्रकाश यहां आने की बजाय किस्मत आजमाने मुंबई चले गए थे। 

इस कारण बदलना पड़ा था नाम

1982 में ओमप्रकाश जमशेदपुर आए थे। लौटते वक्त सोनारी एयरपोर्ट पर अपनी पत्नी पद्मा रानी, छोटे भाई सुभाषचंद्र की बेटी वंदना व किशोर थम्मन के साथ।

सुभाषचंद्र बताते हैं कि उनके बड़े भाई काफी दिनों तक ओमप्रकाश के नाम से ही फिल्मी दुनिया में चर्चित रहे, लेकिन एक समस्या की वजह से उन्हें नाम बदलना पड़ा था। दरअसल, उन दिनों कामेडियन ओमप्रकाश भी खासे लोकप्रिय थे, जिससे लोगों को अक्सर गलतफहमी होती थी। दोस्तों के सुझाव पर ही उन्होंने अपने पिता जगतराम का नाम अपने नाम के आगे जोड़कर जे. ओमप्रकाश कर लिया।

भारत विभाजन के वक्त चले गए थे मुंबई

सुभाषचंद्र बताते हैं कि बड़े भाई जे. ओमप्रकाश शुरू से फिल्मों से जुड़े रहे। वे भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान में लाहौर फिल्म इंडस्ट्री के साथ ही मुंबई चले गए थे। तब वे फिल्म निर्माता मोहन सहगल की यूनिट में चीफ एक्जीक्यूटिव थे। मोहन सहगल की फिल्म 'लाजवंती' में ओमप्रकाश सहायक निर्देशक थे। मुंबई आने के बाद जे. ओमप्रकाश ने फिल्म बनाने की इच्छा जताई, इसके लिए मोहन सहगल ने उन्हें चार लाख रुपये दिए थे। जे. ओमप्रकाश की इस पहली फिल्म का नाम 'आस का पंछी' था। इसके बाद जे. ओमप्रकाश  ने 'आई मिलन की बेला' बनाई, जिससे जे. ओमप्रकाश मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में सफल निर्देशक के रूप में शुमार हो गए। इसके बाद तो उन्होंने 'जैसी करनी वैसी भरनी', 'आप आए बहार आई', 'आशा', 'आन मिलो सजना' समेत करीब 35 फिल्में बनाईं। फिल्मों में व्यस्तता की वजह से जे. ओमप्रकाश ज्यादातर मुंबई में ही रहते थे, लेकिन यहां अपने भाइयों के सुख-दुख में अक्सर आते रहते थे। 

जे. ओमप्रकाश मेरे जेठ भी लगते थे और बहनोई भी

फिल्म निर्देशक जे. ओमप्रकाश के भाई सुभाष चंद्र व उनकी साली सुधेश रानी अपने घर में।

सुभाषचंद्र की पत्नी सुधेश रानी बताती हैं कि जे. ओमप्रकाश उनके जेठ भी लगते थे और बहनोई भी। जे. ओमप्रकाश की पत्नी पद्मा रानी मेरी चचेरी बहन लगती हैं। पद्मा रानी अपनी तीन सगी बहनों में भी सबसे बड़ी हैं। उनकी सबसे छोटी बहन सरोज की शादी फिल्म निर्माता मोहन कुमार से हुई, जिन्होंने फिल्म 'अवतार' बनाई थी।

उन्हीं की इच्छा थी कि अंतिम संस्कार तत्काल कर दिया जाए

सुभाषचंद्र व उनकी पत्नी सुधेश रानी ने बताया कि जे. ओमप्रकाश का आनन-फानन में अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस बात को वे मृत्यु से पहले लिखकर गए थे। आज सुबह दीदी (जे. ओमप्रकाश की पत्नी पद्मा रानी) से बात हुई, तो उन्होंने भाइयों को मुंबई आने से मना किया। बताया कि अत्यधिक बारिश की वजह से मुंबई का जनजीवन अस्त-व्यस्त है, इसलिए तुम लोग अभी आने का कष्ट मत करना। 

हरहरगुट्टू, रिफ्यूजी कालोनी व टेल्को कालोनी भी आए थे जे. ओमप्रकाश

जमशेदपुर के हरहरगुट्टू में अपने परिवार के साथ फिल्म निर्देशक जे. ओमप्रकाश-1965 में।

सुभाषचंद्र बताते हैं कि जे. ओमप्रकाश और उनकी पत्नी पद्मा रानी हरहरगुट्टू भी आए थे, तो रिफ्यूजी कालोनी भी। जालंधर से आने के बाद 1952 से 1967 तक वे लोग हरहरगुट्टू में रहते थे। रिफ्यूजी कालोनी में एक साल 1967 में मिल्खीराम के घर पर किराये में रहे, जबकि इसके बाद टेल्को कालोनी स्थित कंपनी क्वार्टर में रहने लगे। सेवानिवृत्ति के बाद से सोनारी में रह रहे हैं। अब उनके बच्चे दूसरे शहरों में रहते हैं।

 

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Posted By: Rakesh Ranjan

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