सुधीर पांडेय, चाईबासा।  पिता बच्चों का जन्मदाता और भाग्य विधाता होता है। बच्चों के पालन- पोषण की उनकी जिम्मेदारी होती है। मेरे पिता की शिक्षा के प्रति सकारात्मक सोच, दृढ इच्छा शक्ति एवं मेहनत के कारण ही आज मैं आइपीएस हूं। पश्चिमी सिंहभूम के पुलिस अधीक्षक अजय लिंडा ने फादर्स डे के मौके पर दैनिक जागरण से अपने जीवन में पिता के महत्व को साझा करते हुए यह उद्गार व्यक्त किये।

रांची के नगड़ी थाना अंतर्गत डोरिया टोली गांव से आइपीएस बनकर निकले अजय लिंडा कहते हैं, "मेरे पिता स्वर्गीय बिगल लिंडा मुख्यतः एक किसान थे। पढ़े - लिखे नहीं थे। उन्होंने एचईसी में मजदूर के रूप में ज्वाइन किया तथा वेल्डर बनकर रिटायर हुए। खुद एक मजदूर होकर भी उन्हें अपने बच्चों को पढ़ाई-लिखाई कराने की दृढ़ इच्छा थी। वह स्वयं पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन अपने अनुभव तथा माहौल से सीखते हुए निर्णय लेते थे। वह अपने ऑफिसर्स की बातों को और उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के बारे में बहुत ध्यान से सुनते थे तथा वह चाहते थे कि उनके ऑफिसर्स के बच्चे जैसे उनके बच्चे भी पढ़ें।" लाल मार्क मतलब फेल

अपने स्कूली दिनों को याद करते हुए आइपीएस अजय लिंडा बोले, "पढ़ाई - लिखाई के मामले में बहुत सख्त थे। हम लोगों को रोज स्कूल जाना अनिवार्य था। अगर हम स्कूल नहीं जाते थे तो उस दिन हमें शाम का खाना नहीं मिलता था। हमारे रिजल्ट कार्ड में वह देखना चाहते थे कि कोई लाल मार्क तो नहीं है। अगर लाल मार्क होता था तो उनको लगता था कि हम फेल हो गए हैं और लाल मार्क नहीं होने से उनको लगता था कि पास हैं और बहुत खुश होते थे।

अनुशासन बहुत सख्त

हमारे घर में बहुत सख्त अनुशासन था। हम सभी लोग करीब 5:00 बजे सुबह एक साथ उठ जाते थे और जाड़ों के दिनों में भी 4:00 बजे उठ जाते थे क्योंकि खलिहान जाना पड़ता था। हम सभी लोग शाम में एक साथ एक चटाई पर सोते थे। शाम में एक साथ बैठते थे। खाना चूल्हा में बनता था और हम गपशप करते रहते थे।"

बुरा तो सोचो मत

पुलिस अधीक्षक ने कहा कि पिताजी बहुत ही निपुण कृषक थे। बरसात की सही भविष्यवाणी करना तथा समय पर खेती लगाना उनकी विशेषता थी। वह मछली मारने में बहुत निपुण थे। तीर-धनुष चलाने में महारत थे। जो भी काम करते थे बहुत लगन के साथ करते थे। जो काम उनको अच्छा नहीं लगता था वह नहीं करते थे। उन्होंने कभी मानव मूल्यों के साथ समझौता नहीं किया। वह अपने मान सम्मान को ठेस नहीं लगने देना चाहते थे। वह किसी का बुरा ना सोचते थे ना करते थे। अपने ही कामों में लगे रहते थे। दिसंबर 2011 में वो हमें छोड़कर चले गये। मगर अपने जीवनकाल में उन्होंने हमें जो मूल्य सिखाया वही आज भी हमारे लिए पथ प्रदर्शक हैं। प्रेरणा स्रोत हैं।

Edited By: Rakesh Ranjan