घर लौटे 'दलमा राजा', पत्नी की सूनी मांग में फिर भरा सिंदूर; गांवों में फिर महकी तेल-मसाले की खुशबू
सेंदरा पर्व के औपचारिक समापन पर दलमा राजा राकेश हेम्ब्रम शिकार अभियान से सकुशल लौटे। उनकी पत्नी ने पारंपरिक रीति-रिवाजों ...और पढ़ें

दलमा राजा राकेश हेंब्रम ने अपनी पत्नी की मांग में सिंदूर भरकर वैवाहिक परंपरा को पुनर्स्थापित किया।
HighLights
सेंदरा पर्व का औपचारिक समापन, दलमा राजा की वापसी।
दो दिन बाद घरों में तेल-मसाले का भोजन बना।
जागरण संवाददाता जमशेदपुर। आदिवासी संस्कृति और अदम्य साहस के प्रतीक पारंपरिक सेंदरा पर्व का मंगलवार को औपचारिक समापन हो गया। शिकार अभियान से सुरक्षित लौटने के बाद दलमा राजा राकेश हेम्ब्रम का उनके आवास पर पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ भव्य स्वागत किया गया।
पुनर्स्थापित हुई वैवाहिक परंपरा
इस दौरान पूरा वातावरण ढोल-नगाड़ों की गूंज और उत्सव के उल्लास से सराबोर रहा। जैसे ही दलमा राजा अपने आंगन में पहुंचे, उनकी पत्नी ने विधि-विधान से राजा और उनके साथ आए शिकारियों के पैर धोकर उनका अभिनंदन किया।
सेंदरा की सबसे अनूठी परंपरा तब देखने को मिली जब राजा ने अपनी पत्नी की खाली मांग में फिर से सिंदूर भरा और शिकार पर जाते समय उतारा गया कंगन पुनः उनके हाथों में पहनाया।
सिंदूर और कंगन त्यागने के पीछे का रहस्य
दलमा राजा राकेश हेम्ब्रम ने इस परंपरा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि सेंदरा को आदिवासी समाज में एक पारंपरिक युद्ध के रूप में देखा जाता है। प्राचीन मान्यता है कि जब पुरुष इस जोखिम भरे अभियान पर निकलते हैं, तो उनकी पत्नियां घर पर अपनी मांग का सिंदूर हटा देती हैं और कंगन उतार देती हैं।
यह उनके पति के सुरक्षित लौटने तक के संयम और प्रार्थना का प्रतीक है। राजा के लौटने पर ही वैवाहिक प्रतीकों को दोबारा धारण किया जाता है।
दो दिन बाद घरों में बना तेल-मसाले का भोजन
सेंदरा पर्व केवल जंगल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर घरों की रसोई पर भी पड़ता है। परंपरा के अनुसार, दो दिनों तक आदिवासी परिवारों में तेल-मसाले का उपयोग पूरी तरह वर्जित रहता है और केवल सादा भोजन ही किया जाता है।
मंगलवार रात जब सेंदरा बीर (शिकारी) विजयी होकर गांवों में लौटे, तब घरों में फिर से सामान्य और स्वादिष्ट भोजन बनना शुरू हुआ। इस बदलाव ने पर्व के समापन की खुशी को दोगुना कर दिया।
इस पारंपरिक उत्सव के दौरान लाल सिंह गागराई, घनश्याम संवैयां, लीटाबन सिंह, धानो मार्डी, संपूर्ण संवैयां, डेमका सोय, जेना जामुदा और बल्ही मार्डी सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। सभी ने आदिवासी संस्कृति की इस अनूठी विरासत को सहेजने पर बल दिया।
