दलमा में मिलीं 250 से ज्यादा प्रजाति की तितलियां: Blue moon से लेकर लेमन पैंसी तक... जंगल में चल रहा Nature का 'जादू'
झारखंड के घने जंगल, विशेषकर दलमा वन्यजीव अभयारण्य, रंग-बिरंगी तितलियों का घर बन गए हैं, जहाँ 250 से अधिक प्रजातियाँ दर्ज की गई हैं।

राजधानी रांची से लेकर जमशेदपुर के दलमा और सारंडा के विशाल जंगलों तक तितलियों की सैकड़ों प्रजातियां देखी जा रही हैं।
HighLights
तितलियां पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण संकेतक हैं
ब्लू मून, लेमन पैंसी जैसी दुर्लभ प्रजातियाँ यहां मिलीं।
पर्यावरण और जंगलों की सेहत का महत्वपूर्ण संकेतक
धारीदार अल्बाट्रॉस से लेकर 'ब्लू मून' तक की झलक
जीव-जंतु एवं पर्यावरण मामलों के विशेषज्ञ प्रभात कुमार के अनुसार, झारखंड के जंगलों में कई अत्यंत आकर्षक और दुर्लभ प्रजातियां मौजूद हैं। इनमें मुख्य रूप से:
- कॉमन मॉरमोन (Common Mormon): काले पंखों पर सफेद धब्बों के कारण आसानी से पहचानी जाती है।
- लेमन इमिग्रेंट (Lemon Immigrant): हल्के पीले रंग के पंख इसे बेहद खूबसूरत बनाते हैं।
- लेमन पैंसी (Lemon Pansy): इसके पंखों पर आँख जैसी विशिष्ट आकृतियाँ बनी होती हैं, जो इसे अन्य प्रजातियों से अलग बनाती हैं।
- ब्लू मून (Blue Moon Butterfly): इसके पंखों पर नीले रंग की जादुई चमक देखने को मिलती है।
- अन्य प्रजातियां: इसके अलावा धारीदार अल्बाट्रॉस (Striped Albatross) और रेड पायरेट (Red Pirate) जैसी प्रजातियां भी यहाँ पाई जाती हैं।
वनस्पतियों और तितलियों की अटूट निर्भरता
विशेषज्ञों और वन विभाग का मानना है कि तितलियों के इस रंगीन संसार को बनाए रखने के लिए प्राकृतिक आवासों और स्थानीय वनस्पतियों को संरक्षित रखना बेहद जरूरी है।
क्योंकि प्रकृति की यह छोटी-सी जीव प्रजाति पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को जीवंत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।
तितलियां को उनके प्राकृतिक आवास को बचाना सबसे अधिक जरूरी है। दलमा में 250 प्रकार से अधिक प्रजाति की तितलियां पाई गई है। दलमा के जंगलों में फूलदार पौधों और स्थानीय वनस्पतियों का संरक्षण, रासायनिक प्रदूषण पर नियंत्रण और प्राकृतिक जलस्रोतों को सुरक्षित रखने के कारण ही यहां तितलियों की आबादी बढ़ी है। जंगलों में मौजूद यह रंगीन दुनिया बताती है कि प्रकृति की छोटी-सी प्रजाति भी पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए कितनी महत्वपूर्ण है।
सबा आलम अंसारी, डीएफओ, दलमा
