चक्रधरपुर, दिनेश शर्मा।   झारखंड अपनी रोचक परंपराओं के लिए दुनिया में मशहूर रहा है। यहां के आदिवासी समाज में कई तरह की परंपराएं प्रचलित हैं। हर परंपरा के पीछे उसका अपना मजबूत अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र है। ऐसी ही एक रोचक परंपरा है- मुर्गे की बलि। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ समझे जानेवाले गाय और बैल स्वस्थ्य रहें, इसलिए आदिवासी समाज इस परंपरा को वंदना पर्व के दौरान निभाता है। 

कोल्हान प्रमंडल के गांव-कस्बों में वंदना पर्व की तैयारी शुरू हो गई है। दीपावली के ठीक दूसरे दिन यह त्योहार मनाया जाता है। पर्व से तीन, पांच या सात दिनों पहले लोग गाय-बैल के सींग पर तेल लगाना शुरू कर देते हैं। एक तरह से तेल लगाकर इनका स्वागत किया जाता है। तेल लगाने के बाद मांसाहारी भोजन निषेध रहता है। ऐसी मान्यता है कि इस दौरान मांसाहारी भोजन करने से मवेशियों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

अंडा फोडऩे वाले मवेशी के पालक को मिलता है विशेष सम्मान 

हर दिन तेल लगाने के बाद सामूहिक गोट पूजा का आयोजन किया जाता है। गांव के बाहर किसी जगह एक अंडा रखकर पूजा की जाती है। इसके बाद गांव के सभी गाय बैल को एकसाथ अंडा के ऊपर गुजारा जाता है। जिसका मवेशी अंडे को फोड़ देता है, उसे लोग सम्मानपूर्वक मैदान से कंधों पर उठाकर उसके घर तक पहुंचाते हैं। उसी व्यक्ति के घर से नृत्य-गीत का कार्यक्रम प्रारंभ होता है। प्रत्येक घर में जाकर गीत-नृत्य के माध्यम से गाय-बैल का स्वागत किया जाता है।

अल्पना बनाकर इस तरह गाय को सम्मान देते हैं पशुपालक 

दिन में गोट पूजा के बाद अमावस्या को रात भर लोग रंग और अबीर भी खेलते हैं। दूसरे दिन गोहाल पूजा का आयोजन किया जाता है। अमावस्या समाप्त होते ही गोहाल पूजा होती है। प्रत्येक गोहाल में कृषक मुर्गे और मुर्गी की बलि चढ़ाकर अपने मवेशियों के स्वास्थ्य की मंगल कामना करते हैं। इस अवसर पर मवेशियों के स्वागत में संध्या होते ही आंगन में अल्पना बनाई जाती है। अल्पना में गाय का स्वागत करने के बाद ही किसी अन्य मवेशियों को प्रवेश मिलता है। प्रवेश करने के पहले धान के पौधों से बने मोढ़ व दीप दिखाकर गायों का स्वागत होता है। इस मौके पर गाय-बैल सजाए भी जाते हैं। इसके बाद बैल के साथ ग्रामीण नृत्य करते हैं। वंदना पर्व के अंतिम दिन को बूढ़ी वंदना के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग मौज-मस्ती करते हैं। 

Posted By: Rakesh Ranjan

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