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पुरुलिया का प्रसिद्ध गांव चड़िदा: मुखौटा कला के साथ-साथ अब मूर्तिकला में भी बिखेर रहा है अपनी कला की छटा

Published: Wed, 14 Oct 2026 07:13 PM (IST)

पश्चिम बंगाल का चड़िदा गांव अपनी अनूठी मुखौटा कला के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन सीमित आय के कारण यहां के ...और पढ़ें

मां दुर्गा की प्रतिमा को अंतिम रूप देता शि‍ल्‍पकार।

मां दुर्गा की प्रतिमा को अंतिम रूप देता शि‍ल्‍पकार।

HighLights

  1. चड़िदा गांव मुखौटा कला और छऊ नृत्य के लिए प्रसिद्ध।

  2. सीमित आय से कारीगर त्योहारों पर बनाते हैं मूर्तियां।

  3. कलाकार आर्थिक चुनौतियों के बावजूद कला को जीवित रखे हैं।

तापस कुईरी, बाघमुंडी। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में अयोध्या पहाड़ की गोद में बसा चड़िदा गांव अपनी अनूठी मुखौटा कला के लिए देश-दुनिया में प्रसिद्ध है। 

 
इस गांव की मुख्य पहचान छऊ नृत्य के पारंपरिक मुखौटों से है। यहां के अधिकांश परिवार पीढ़ियों से मिट्टी की मूर्तियां, छऊ मुखौटे और सजावटी सामान बनाने के काम से जुड़े हुए हैं। 
 
हालांकि, इस पारंपरिक कला से होने वाली आमदनी पूरे साल परिवार का खर्च चलाने के लिए पर्याप्त नहीं होती। यही मुख्य वजह है कि हर साल दुर्गापूजा और कालीपूजा के दौरान चड़िदा के मूर्तिकार देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी कला का जौहर दिखाने के लिए रवाना हो जाते हैं।
 
स्थानीय मूर्तिकार रतन सूत्रधार और जितेंद्रनाथ सूत्रधार बताते हैं कि इस वर्ष भी चड़िदा के 150 से अधिक कारीगर जून-जुलाई में ही अन्य राज्यों के लिए निकल चुके हैं। 
 
मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ और विशाखापत्तनम सहित देश के कई राज्यों में इन कारीगरों की भारी मांग है। 
 
दुर्गापूजा और कालीपूजा के पावन अवसर पर ये कुशल कारीगर अपनी उंगलियों के हुनर से देवी-देवताओं की भव्य प्रतिमाओं को आकार देते हैं और आकर्षक सजावट करते हैं।
 
चड़िदा के कारीगर करीब तीन से चार पीढ़ियों से अपनी इस पारंपरिक कला को सहेजते आ रहे हैं। छऊ नृत्य के लिए मुखौटे तैयार करना और पर्यटकों के लिए स्मृति चिह्न बनाना उनकी आजीविका का मुख्य जरिया है। 
 
लेकिन उत्पादों की सीमित बिक्री के कारण कमाई भी सीमित ही रहती है। ऐसे में, त्योहारों का यह सीजन उनके लिए अतिरिक्त आमदनी का सबसे बड़ा अवसर बनकर आता है। 
 
दूसरे राज्यों में जाकर कड़ी मेहनत करने वाले इन कलाकारों को दुर्गापूजा और दीपावली के दौरान अच्छी कमाई की उम्मीद रहती है। त्योहार का मौसम समाप्त होने के बाद वे वापस अपने गांव लौट आते हैं और फिर से अपनी पुश्तैनी कला के काम में जुट जाते हैं।
 
आज चड़िदा के इन कलाकारों का हुनर केवल पश्चिम बंगाल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश के कोने-कोने में उनकी कला की गहरी छाप दिखाई देती है। 
 
यह बेहद सराहनीय है कि ये कलाकार तमाम आर्थिक चुनौतियों के बावजूद अपनी प्राचीन संस्कृति और पुश्तैनी कला को पूरी शिद्दत से जीवित रखे हुए हैं। 
 
हालांकि, यह भी सच है कि बेहतर आजीविका और परिवार के भरण-पोषण के लिए उन्हें हर साल अपने घर-परिवार से दूर अन्यों राज्यों का रुख करना पड़ता है।