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खाकी और खादी का कनेक्शन: यशवंत सिन्हा से बीडी राम और दिव्या मित्तल तक... झारखंड में 'बाबुओं' के सियासी सफर की पूरी कहानी

By Pradeep SinghEdited By: Sanjeev Kumar
Published: Tue, 29 Sep 2026 06:59 PM (IST)

प्रशासनिक सेवा छोड़कर राजनीति में आने का सिलसिला नया नहीं है, और दिव्या मित्तल के बाद यह बहस फिर तेज ...और पढ़ें

उत्तर प्रदेश कैडर की पूर्व आइएएस अधिकारी दिव्या मित्तल के हालिया राजनीतिक पदार्पण की घोषणा के बाद एक बार फिर बहस तेज हो गई है।

उत्तर प्रदेश कैडर की पूर्व आइएएस अधिकारी दिव्या मित्तल के हालिया राजनीतिक पदार्पण की घोषणा के बाद एक बार फिर बहस तेज हो गई है।

HighLights

  1. दिव्या मित्तल के राजनीति में आने से नौकरशाहों की सियासी राह पर बहस।

  2. झारखंड में पूर्व IAS-IPS अधिकारियों का राजनीति में प्रवेश का लंबा इतिहास।

  3. प्रशासनिक पहचान चुनावी सफलता की सीधी गारंटी नहीं होती।

प्रदीप सिंह, जमशेदपुर। प्रशासनिक सेवा की प्रतिष्ठित कुर्सी छोड़कर सियासत की राह पकड़ने का सिलसिला नया नहीं है। हालांकि, जब भी कोई चर्चित नौकरशाह सरकारी सेवा से बाहर निकलकर राजनीति में कदम रखता है, तो यह सवाल दोबारा बहस के केंद्र में आ जाता है। 
 
आखिर प्रशासनिक अनुभव के बाद अधिकारी राजनीति का रास्ता क्यों चुनते हैं? साथ ही, चुनावी राजनीति में उनका अनुभव और सफलता का ग्राफ कैसा रहता है?
 
उत्तर प्रदेश कैडर की 2013 बैच की पूर्व आइएएस अधिकारी दिव्या मित्तल के हालिया राजनीतिक पदार्पण की घोषणा के बाद एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है। 
 
13 वर्ष की प्रशासनिक सेवा के बाद उन्होंने इस्तीफा दिया था, जिसे केंद्र सरकार ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करने का ऐलान किया है, हालांकि फिलहाल उन्होंने किसी विशिष्ट राजनीतिक दल में शामिल होने की घोषणा नहीं की है।
 

झारखंड में नौकरशाहों के राजनीति में आने का पुराना इतिहास 

झारखंड की राजनीति में नौकरशाहों के प्रवेश का लंबा और समृद्ध इतिहास रहा है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में ही पांच पूर्व आइपीएस अधिकारी- डॉ. अजय कुमार, अमिताभ चौधरी, बीडी राम, सुबोध प्रसाद और रामेश्वर उरांव चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे थे।
 
इनमें से डॉ. अजय कुमार और रामेश्वर उरांव पहले से ही संसदीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे, जबकि पूर्व डीजीपी बीडी राम ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के टिकट पर पलामू से चुनाव जीतकर पहली बार लोकसभा में प्रवेश किया। 
 
इसके अलावा अमिताभ चौधरी और सुबोध प्रसाद ने भी चुनावी मैदान में उतरकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। डॉ. अजय कुमार ने आइपीएस की नौकरी छोड़कर राजनीति को चुना और जमशेदपुर से सांसद बनकर लोकसभा पहुंचे। 
 
इसी तरह, रामेश्वर उरांव ने भी पुलिस सेवा से त्यागपत्र देकर कांग्रेस के साथ अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की और लोहरदगा से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे।
 

आइएएस अधिकारियों के प्रयास और सफलता का ग्राफ 

आइएएस अधिकारियों के संदर्भ में जेबी तुबिद का उदाहरण प्रमुखता से लिया जाता है। उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) लेकर सक्रिय राजनीति में कदम रखा।
 
वर्ष 2014 के चुनाव में भाजपा के टिकट पर चाईबासा विधानसभा सीट से भाग्य आजमाया, हालांकि उन्हें सफलता नहीं मिल सकी।
 
इसी प्रकार पूर्व आइएएस अधिकारी मुख्तियार सिंह भी भाजपा में शामिल हुए, लेकिन उन्होंने प्रत्यक्ष चुनावी राजनीति से दूरी बनाए रखी।
 
दूसरी ओर, पूर्व आइपीएस अधिकारी लक्ष्मण प्रसाद सिंह ने गिरिडीह जिले की राजधनवार विधानसभा सीट से भाजपा के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा, परंतु वे भी जीत हासिल नहीं कर पाए।
 

यशवंत सिन्हा: प्रशासनिक सेवा से राष्ट्रीय राजनीति तक का सफर 

नौकरशाह से राजनेता बनने वाले दिग्गजों में यशवंत सिन्हा का नाम लंबी पारी के रूप में दर्ज है। वर्ष 1960 में आइएएस सेवा में आए सिन्हा ने 1984 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर राजनीति की राह पकड़ी। 
 
शुरुआती चुनावी प्रयासों में असफलता के बावजूद, बाद में वे हजारीबाग से लोकसभा सांसद निर्वाचित हुए और राज्यसभा सदस्य भी रहे। केंद्र सरकार में उन्होंने वित्त मंत्री और विदेश मंत्री जैसे कई अत्यंत महत्वपूर्ण पदों और दायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वहन किया।
 

क्या प्रशासनिक पहचान चुनावी सफलता की गारंटी है? 

नौकरशाही के दौरान बनी पहचान और साख राजनीति में प्रवेश के लिए एक मजबूत आधार जरूर प्रदान करती है, लेकिन चुनावी राजनीति का गणित प्रशासनिक तंत्र से काफी अलग होता है। 
 
प्रशासनिक सेवा में पद की प्रतिष्ठा, त्वरित निर्णय क्षमता और सरकारी तंत्र को चलाने का अनुभव सीधे वोट बैंक में बदल जाए, यह अनिवार्य नहीं है।
 
झारखंड के उदाहरणों को देखें तो तस्वीर मिलीजुली नजर आती है। कुछ पूर्व आइएएस-आइपीएस अधिकारी राजनीति में बेहद सफल रहे, कुछ को पराजय का सामना करना पड़ा, तो कुछ राजनीतिक दलों से जुड़ने के बावजूद सीधे चुनावी मैदान में नहीं उतरे। 
 
यही कारण है कि जब भी कोई नौकरशाह राजनीति का रुख करता है, तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि प्रशासनिक अनुभव और जनाधार के बीच का अंतर आखिर कितना बड़ा है।