जमशेदपुर (जागरण संवाददाता)। यह संयोग ही कहा जाएगा कि पुस्तक मेला में नाउम्मीदी के साथ अयोध्या पर आई किताबें, शनिवार को फैसला आते ही हाथों-हाथ बिक गई।

साकची स्थित रवींद्र भवन में स्टॉल लगाए पूजा बुक हाउस के सूरज जायसवाल ने बताया कि उन्होंने हर बार की तरह अयोध्या पर तीन किताबों की पांच-पांच कॉपी लाई थी। अब तक हर साल इनमें से दो-तीन ही बिकती थीं। इस बार तो गजब हो गया।

शनिवार को ही आधी से ज्यादा किताबें बिक गई। इनमें सबसे ज्यादा पत्रकार हेमंत शर्मा द्वारा लिखित 'अयोध्या का चश्मदीद' की रविवार दोपहर तक एक कॉपी ही बची थी। 900 रुपये मूल्य वाली इस किताब को दोबारा भेजने के लिए कोलकाता ऑर्डर दिया। हेमंत शर्मा की ही 'युद्ध में अयोध्या' की भी दो ही प्रति बिकी है, जबकि लेखक देवेंद्र स्वरूप की 'अयोध्या का सच' की मांग अपेक्षाकृत कम है। जायसवाल बताते हैं कि अयोध्या का मुद्दा इतने लंबे समय से चल रहा था कि इसके बारे में सुनते-सुनते लोगों के कान पक गए थे। अब इसमें लोग बस यही जानना चाहते थे कि मंदिर कब बनेगा।

उन्होंने भी अनमने ढंग से यह पुस्तक लाई थी, लेकिन पुस्तक मेला शुरू होने के दूसरे दिन ही अयोध्या पर फैसला आ गया। उधर, पुस्तक मेला में कोलकाता की लेखिका अलका सरावगी के उपन्यास 'एक ब्रेक के बाद' भी खूब बिक रही है। राजकमल प्रकाशन के वरिष्ठ विक्रय प्रतिनिधि डीए पांडेय ने बताया कि 'कलिकथा वाया बाईपास' की रिकार्ड बिक्री के बाद अलका सरावगी का यह उपन्यास भी खूब बिक रहा है। इसका दूसरा संस्करण इसी वर्ष आया है। इसमें एक बुजुर्ग की कहानी है, जिनके पास रिटायरमेंट के बाद नौकरी की लाइन लगी है।

अमूमन सेवानिवृत्ति के बाद लोग यही सोचकर चिंतित रहते हैं कि अब क्या करें। समाज के लोग भी उन्हें बोल-बोलकर बूढ़ा बनाने पर तुले रहते हैं। ऐसे में यह पुस्तक बुजुर्गो में एक उम्मीद जगाती है।

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