जमशेदपुर, दिलीप कुमार।  झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के बोड़ाम प्रखंड के पहाड़ों और जंगलों से घिरा एक गांव है 'भुला'। इस गांव के बाहर एक स्थान पर प्राचीन काल की मूर्तियां और धरोहरों के भग्नावशेष बिखरे पड़े हैं। इस स्थान पर भूमिज मुंडा समाज का हाड़शाली यानी श्मशान है।

 इन भग्नावशेष के महत्व को समझते हुए सरकार और विभाग नहीं बल्कि 'विरासत संरक्षण संस्थान' पीढ़ी दर पीढ़ी इसे सुरक्षित रखे हुए है। प्राचीन मूर्ति व भग्नावशेष राजा विक्रमादित्य काल के बताए जाते हैं। मूर्तियां व पुरातात्विक धरोहर यहां कब और कैसे पहुंची, यह किसी को भी पता नहीं है। गांव और आसपास के क्षेत्र में प्रचलित कथा के अनुसार राजा विक्रमादित्य ने 'बेताल' से अपने सभी इष्ट देवी-देवताओं की मूर्तियां बनवाने की इच्छा प्रकट की थी, तब बेताल ने ही इन मूर्तियों का निर्माण किया था। कुछ लोग इन विरासतों को गौतम बुद्ध और महावीर जैन से भी जोड़ कर देखते हैं। प्राचीन मूर्तियों और धरोहरों को बौद्ध व जैन के समय के बताते हैं। भुला के अलावा डांगडुंग और पवनपुर में भी पुरातात्विक धरोहर के भग्नावशेष हैं।

पौष संक्रांति में जुटते हैं लोग

पौष संक्रांति में और अन्य विशेष अवसरों पर यहां पूजा-पाठ की जाती है। भुला में पौष मेला भी लगता है। दूर-दराज से लोग जुटते हैं। वैसे यहां कई लोग रोज व्यक्तिगत रूप से पूजा करते हैं।

बनाया जा सकता बेहतर पर्यटन स्थल

चारदीवारी से घिरे विशाल परिसर में मौलिक सुविधाओं का इंतजाम कर इसे पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है। पर्यटन, पुरातत्व और आस्था की दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण स्थल है। पत्थर कि मूर्तियां मानो अपने आप में अपने कालखंड का संपूर्ण इतिहास समेटे हुए हैं, जो पुरातत्व और भक्ति में रुचि रखने वालों को सहज ही आकर्षित करतीं हैं।

ऐसे पहुंच सकते भुला

यहां पहुंचने के लिए जमशेदपुर के डिमना चौक से पटमदा जाने के रास्ते पर लगभग दस किलोमीटर आगे बढऩे से भुइयांसिनान गांव मिलेगा। भुइयांसिनान से बाईं ओर नौ किलोमीटर चलने के बाद हाथीखेदा मंदिर से पहले ही भुला गांव मिलेगा। इसके अलावा पटमदा के बेलटांड मोड़ से बाईं ओर बोड़ाम जाने वाली सड़क से, पश्चिम बंगाल के बड़ाबाजार के रास्ते से और चांडिल से नीमडीह के रास्ते भी भुला पहुंचा जा सकता है। 

Posted By: Rakesh Ranjan

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