जमशेदपुर, अमित तिवारी।  सेवा का मतलब है-बदले में कुछ पाने की भावना रखे बिना किसी व्यक्ति के लिए कुछ करना। इसी सोच के साथ महात्मा गांधी मेमोरियल (एमजीएम) मेडिकल कॉलेज अस्पताल के एंबुलेंस चालक गौरी महाली कोरोना मरीजों की सेवा में दिन-रात जुटे रहे। इस दौरान खुद भी संक्रमित हुए लेकिन हार नहीं मानी। लड़ा, जीता और फिर से मरीजों की जान बचाने में जुट गए।

जमशेदपुर में जब कोरोना की इंट्री हुई तो गौरी महाली को बड़ी जिम्मेवारी सौंपी गई। एक तरफ एमजीएम में आने वाले कोरोना के गंभीर मरीजों को टाटा मुख्य अस्पताल या फिर टाटा मोटर्स अस्पताल पहुंचाना था तो दूसरी तरफ बिना लक्षण वाले मरीजों को सिदगोड़ा, कदमा व मानगो क्वारंटाइन सेंटर भी ले जाना था। गौरी महाली खुद मोटापा, शुगर व हाई ब्लड प्रेशर के रोगी थे। ऐसे में उनके सामने एक बड़ी चुनौती आ खड़ी हुई लेकिन वे हार नहीं माने।

जिम्‍मेदारी का अहसास

गौरी महाली कहते हैं कि उस दौरान मेरे जैसे लोगों को सबसे अधिक संक्रमित होने का खतरा था। मौत का कारण भी यही तीन बीमारी बन रही थी। लेकिन, मैंने उस दौरान सच्चे मन से मरीजों की सेवा की। मन में ख्याल तो कई सारे आते थे लेकिन यह भी सोचता था कि इस मोर्चे पर अगर मैं पीछे हट जाउं तो जिंदगी मुझे कभी माफ नहीं करेगी। अपनी जान बचाने के लिए दूसरों की जिंदगी दांव पर नहीं लगाई जा सकती। क्योंकि उस दौरान अगर मैं पीछे हट जाता तो कोरोना संक्रमित मरीजों को बेहतर इलाज के लिए एमजीएम से दूसरे अस्पताल ले जाने में काफी मुश्किल होती और अधिकांश लोगों की मौत इलाज के अभाव में होने लगती। गौरी महाली कहते हैं कि मैंने ठान लिया था, जो होगा देखा जाएगा, लेकिन अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटूंगा।

लोग कहते थे ले तो छुट्टी, घर-परिवार भी देखना है

गौरी महाली मोटापा, शुगर व हाई ब्लड प्रेशर के रोगी हैं। ऐसे में उस दौरान जो भी लोग सुनते थे कि मेरी ड्यूटी कोरोना मरीजों की सेवा में लगी है तो वही कहने लगते थे कि छुट्टी ले लो। क्योंकि तुम्हें संक्रमित होने का खतरा काफी अधिक है। घर-परिवार भी चलाना है। इस दौरान मैं संक्रमित भी हो गया। पत्नी व बच्ची की जांच हुई तो उनका रिपोर्ट भी पॉजिटिव आ गई। इसके बाद हम तीनों एमजीएम अस्पताल में भर्ती हो गए। लेकिन मैं कभी डरा नहीं। खुद का हौसला भी बढ़ाए रखा और पत्नी व बच्ची का भी हौसला बढ़ाते रहा। गौरी महाली 19 दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहे। इस दौरान उनका 18 किलो वजन घटकर 91 किलो पहुंच गया। भर्ती होने से पूर्व गौरी महाली का वजन 108 किलो था।

जिम्मेवारी से पीछे हटना समाधान नहीं

गौरी महाली कहते हैं कि हमेशा एक जैसा समय नहीं रहता। उस दौरान अगर मैं अपने बीमारी का हवाला देकर पीछे हट जाता तो शायद मेरे जिंदगी में एक सवाल घर कर जाती, जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता। अब अच्छा इसी बात का लगता है कि मैं भी कहता हूं कि कोरोना जैसे महामारी से निपटने में हमने भी भरपूर सेवा दी है। 200 से अधिक मरीजों को टीएमएच, टाटा मोटर्स अस्पताल सहित शहर के विभिन्न क्षेत्रों में बने क्वारंटाइन सेंटर में पहुंचाने का कार्य किया हूं। दिन के दो बजे भी तैयार रहता था और रात के 12 बजे भी फोन आने पर उठकर चल देता था।

 

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