जमशेदपुर, जासं। एयर इंडिया टाटा के पास चली गई है, अब इसके सुनहरे भविष्य का आकलन किया जा रहा है। क्या सचमुच ऐसा होगा, इस पर चर्चा हो रही है। इसकी वजह है कि पिछले दो दशक में एयर इंडिया ने लगातार अपनी साख गिराई है। पायलटों की हड़ताल हो या परिसंपत्तियों का निष्क्रिय होना। कारण चाहे कुछ भी हो, यह तो सभी मानते हैं कि हाल के दौर में दूसरी विमानन कंपनियों ने जिस तेजी से उड़ान भरी है, उसमें एयर इंडिया काफी पीछे छूट चुका है।

एयर इंडिया को मुनाफे में लाने की रणनीति

टाटा ने अभी तक अपनी रणनीति का खुलासा नहीं किया है कि वह एयर इंडिया को कैसे मुनाफे में लाएगी, लेकिन फिलहाल जो दिख रहा है, उसमें टाटा का इतिहास सबसे बड़ा उदाहरण है। जब कंपनियां प्रतिस्पर्धात्मक रूप से नहीं चलती हैं, तो हर गुजरते दिन के साथ वे ग्राहकों, बाजारों, प्रौद्योगिकी और कौशल सेट के साथ और अधिक गलत हो जाते हैं, और उनके मूल्य में गिरावट बढ़ती है।

भारत सरकार की भी कुछ नवरत्न कंपनियां आज इसी वजह से अपना ताज खो चुकी हैं। टाटा ने भी कई कंपनियां खरीदीं और बेचीं, जिसमें कोरस सबसे महत्वपूर्ण है। एयर इंडिया का मामला बताता है कि बदलाव के प्रयास बहुत आसान नहीं होंगे। सरकार अभी भी एलायंस एयर और विभिन्न विमान रखरखाव मरम्मत और संचालन व्यवसायों को रोक रही है।

इंडिगो व सिंगापुर एयरलाइंस से मिलेगी टक्कर

एयर इंडिया आते ही हवा में आधिपत्य नहीं जमाएगी। इसे घरेलू बाजार में इंडिगो और अंतरराष्ट्रीय मार्गों में सिंगापुर एयरलाइंस, अमीरात और एतिहाद से कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी होगी। विलय के बाद बड़े पैमाने पर अर्थव्यवस्था और लागत खुद ब खुद प्रतिस्पर्धा पैदा करते हैं।

विमान के प्रकार में विविधता को कम करना, लोगों का दोहराव, कार्यालय की जगह और मार्ग और विमान, ईंधन और बीमा की खरीद को केंद्रीकृत करना महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वैश्विक और भारतीय अनुभव बताते हैं कि इस तरह के तालमेल को हासिल करना बेहद कठिन काम है।

एयर इंडिया की ताकत इसके कर्मचारी

एक बार फिर यह बात सामने आती है कि सरकारीकरण से पहले जेआरडी टाटा ने एयर इंडिया की जो पौध रोपी थी, वह टाटा घराने की संस्कृति के अनुकूल था। टाटा की दूसरी कंपनियों की तरह एयर इंडिया की ताकत इसके कर्मचारी थे या हैं। यह दुनिया के कुछ बेहतरीन पायलटों और विमान इंजीनियरों का स्रोत रहा है। अमीरात, एतिहाद, कतर एयरवेज, इंडिगो या जेट एयरवेज के प्रदर्शन की रीढ़ हमेशा एयर इंडिया से रही है। हालांकि, इस मामले में लोगों का एकीकरण मूलभूत चुनौती होगी।

विलय नहीं होगा आसान

टाटा को एयर इंडिया, एयर इंडिया एक्सप्रेस, विस्तारा और एयरएशिया का विलय करना आसान नहीं होगा। इसकी वजह है कि इन चारों विमान से जुड़े कर्मचारियों की चार अलग-अलग संस्कृति रही है। सांस्कृतिक एकीकरण से परे एक एकीकृत वरिष्ठता, रैंक और मुआवजे की संरचना स्थापित करने में अड़चनें पैदा होना लाजमी है। अतीत ने दिखाया है कि प्रतिरोध आम तौर पर इतना अधिक होता है कि पायलट विलय के हिस्से के रूप में आने वाली अन्य एयरलाइनों के विमानों को उड़ाने से मना कर देते हैं।

उद्योग, कर्मचारी और ट्रेड यूनियन इस सौदे को भविष्य के सरकारी निजीकरण के लिए एक अग्रदूत के रूप में देखते हैं। टाटा प्रबंधन और यूनियनों को दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य के साथ भारी विश्वास बनाने की जरूरत है। यह केवल एक विश्वसनीय नेतृत्व के माध्यम से हो सकता है जो टाटा जैसे दिग्गज के पास ही है।

Edited By: Jitendra Singh