संवाद सूत्र कटकमसांडी: वन विभाग व वन सुरक्षा समिति की कर्तव्यहीनता, उदासीनता व लापरवाही से प्रखंड क्षेत्र के जंगलों की अंधाधुंध कटाई व वन क्षेत्र की भूमि की धड़ल्ले से अतिक्रमित की जा रही है। जंगलों व पहाड़ों से उत्खनित अवैध मोरम व पत्थरों को क्षेत्र मे संचालित विकास योजनाओं मे इस्तेमाल किया जा रहा है। जंगलों को उजाड़कर खेत व मकान बनाए जा रहे हैं।बता दें कि कटकमसांडी प्रखंड क्षेत्र में वन आश्रयणी के साथ साथ पश्चिमी वन प्रमंडल अधीनस्थ वन क्षेत्र भी है। वन विभाग द्वारा जंगलों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए समिति बनाई गई। मगर फिलहाल समितियां निष्क्रिय है। वहीं वनकर्मियों की कमी के कारण भी जंगलों को उजाड़ा जा रहा है।उल्लेखनीय है कि एक जमाना था ईश्वर की बनाई इस अछ्वुत धरोहर की खूबसूरती देख कर मन प्रफुल्लित हो जाता था। पर्यावरण की गोद में सुंदर फूल, लताएं, हरे-भरे दरख्तों, रंग बिरंगे चहचहाते परिदे, वन्य जीव जंतुओं की मौजूदगी आकर्षण का केंद्र बिदु था। आज कटकमसांडी के अधिकांश जंगली क्षेत्र भूखंड में तब्दील होते नजर आ रही है। जंगल के सटे दर्जनों गांव के ग्रामीण अपने निजी स्वार्थ के लिए सैकड़ों एकड़ जंगलों से पेड़-पौधे व पहाड़ों को काटकर खेत खलिहान, तालाब, मकान तक बना दिया है। मालूम हो कि इस जंगल में कीमती पेड़ों एवं जड़ी बूटियों की कमी नहीं थी। इन जंगलों में सखुआ, काउज, खैर, सलाई, ढौठवा, खौर, सीदा, पैंसार आदि जंगली पेड़ सहित विभिन्न प्रकार के फलों के पौधे केंद, कन्नौद, पियार, डठोर, बैर, कोइर इत्यादि जंगलों में देखने को मिलता था। अब गिने-चुने पेड़ पौधे ही रह गए हैं। जंगलों की कटाई के कारण जंगल में रहने वाले जीव जंतु हाथी, शेर, चीता, हिरण, सांभर, चितरा, कोटरा, खरगोश, भेड़िया, नेवला, लोमड़ी, मोर, असकल, हैरकल, जंगली मुर्गे मुर्गियां आदि जंगली वन्य जीव विलुप्त हो गए हैं और कुछ वन्य जीव जंतुएं विलुप्ति के कगार पर हैं। इस वन्य जीव जंतुओं और जंगलों को बचाने के लिए वन विभाग द्वारा हर साल करोड़ों खर्च दिखाया जाता रहा हैं, मगर परिणाम शून्य है।

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