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जर्मनी में जिसे मिला 'मैन ऑफ द मैच', वो आज पाई-पाई को मोहताज; कहानी हजारीबाग के आदिवासी फुटबॉलर की

Published: Thu, 02 Jul 2026 11:42 AM (IST)

टाटीझरिया के आदिवासी फुटबॉलर अमित सोरेन ने जर्मनी में शानदार प्रदर्शन कर 'मैन ऑफ द मैच' का खिताब जीता, लेकिन ...और पढ़ें

जर्मनी में शानदार प्रदर्शन के बावजूद गांव लौटने को मजबूर हुआ टाटीझरिया का अमित सोरेन। (फोटो: जागरण)

जर्मनी में शानदार प्रदर्शन के बावजूद गांव लौटने को मजबूर हुआ टाटीझरिया का अमित सोरेन। (फोटो: जागरण)

मिथिलेश पाठक, टाटीझरिया (हजारीबाग)। कहते हैं कि प्रतिभा किसी पहचान की मोहताज नहीं होती, लेकिन कई बार आर्थिक अभाव प्रतिभा के सामने सबसे बड़ी बाधा बन जाता है। ऐसा ही मामला हजारीबाग जिले के टाटीझरिया प्रखंड स्थित सिमराढाब गांव के 18 वर्षीय आदिवासी फुटबॉलर अमित सोरेन का है।

जर्मनी में शानदार प्रदर्शन कर ''मैन ऑफ द मैच'' का खिताब जीतने वाला यह युवा खिलाड़ी आज आर्थिक तंगी के कारण अपना फुटबॉल करियर आगे नहीं बढ़ा पा रहा है।

संघर्षों के बीच निखरी प्रतिभा

अमित सोरेन का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में बीता। गांव के बच्चों के साथ कपड़े की गेंद बनाकर फुटबॉल खेलते-खेलते उसमें इस खेल के प्रति गहरी रुचि विकसित हुई। स्कूल स्तर की प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन करते हुए उसने पंचायत, प्रखंड और जिला स्तर तक अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

इसके बाद संत रॉबर्ट हाई स्कूल में आयोजित ट्रायल में उसने पहला चरण सफलतापूर्वक पार किया, लेकिन दूसरे चरण में चयन नहीं हो सका। हालांकि उसने हार नहीं मानी और बेहतर प्रशिक्षण की तलाश जारी रखी।

कोलकाता की एकेडमी से जर्मनी तक का सफर

किसी ने सलाह दी कोलकात जाओ। किसी तरह अमित कोलकाता स्थित बंगाली फुटबॉल एकेडमी पहुंचा, जहां कोच दिगा यातानु ने प्रतिभा को पहचानते हुए प्रशिक्षण का अवसर दिया। एकेडमी से जुड़ने के बाद उसने 11 राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और लगातार बेहतर प्रदर्शन किया।

जनवरी-फरवरी 2026 में एकेडमी की ओर से उसे जर्मनी में आयोजित फुटबॉल प्रतियोगिता में खेलने का मौका मिला। वहां उसकी टीम ने 11 मुकाबलों में से आठ में जीत दर्ज की। अमित ने अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन से सभी का ध्यान आकर्षित किया और एक मुकाबले में ''मैन ऑफ द मैच'' का पुरस्कार भी अपने नाम किया।

आर्थिक तंगी बनी सबसे बड़ी बाधा

जर्मनी से लौटने के बाद आर्थिक संकट के कारण अमित को फुटबॉल एकेडमी छोड़कर अपने गांव लौटना पड़ा। अमित का कहना है कि खेल के दौरान उसे कई पुरस्कार, प्रमाणपत्र और कुछ नकद राशि भी मिली, लेकिन वह राशि एकेडमी में ही जमा करा ली गई।

आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वह आगे का प्रशिक्षण जारी नहीं रख सका। अमित कहता है कि आज भी उसका सपना देश के लिए फुटबॉल खेलना है, लेकिन आर्थिक अभाव उसके रास्ते में सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है।

मजदूर पिता के बेटे ने देखा बड़ा सपना

अमित के पिता टेकलाल सोरेन दिहाड़ी मजदूर हैं, जबकि मां रानी देवी गृहिणी हैं। परिवार में दो बहनें प्रीति और प्रियंका भी पढ़ाई कर रही हैं। अमित ने पहली से पांचवीं तक की पढ़ाई गांव के प्राथमिक विद्यालय से की। इसके बाद छठी से आठवीं तक की शिक्षा हजारीबाग के आवासीय विद्यालय में प्राप्त की।

मैट्रिक की परीक्षा खैरा करमा उच्च विद्यालय से उत्तीर्ण करने के बाद वह वर्तमान में झरपो स्थित मां विंध्यवासिनी डिग्री कॉलेज में इंटरमीडिएट (12वीं) की पढ़ाई कर रहा है।

कभी गोलियों की गूंज से दहला था सिमराढाब, अब निकल रही प्रतिभाएं

एक समय सिमराढाब गांव उग्रवाद और गोलीबारी की घटनाओं के कारण चर्चा में रहता था। गांव में लंबे समय तक पुलिस पिकेट भी तैनात रही। समय के साथ हालात सामान्य हुए और ग्रामीण खेती, मजदूरी तथा बच्चों की शिक्षा पर ध्यान देने लगे।

अब इसी गांव से खेल सहित विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिभाएं उभर रही हैं। अमित सोरेन भी उन्हीं युवाओं में शामिल है, जिसने सीमित संसाधनों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर तक अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। आज जरूरत है कि ऐसे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को समय पर आर्थिक और संस्थागत सहयोग मिले, ताकि उनकी मेहनत और सपने अभावों की भेंट न चढ़ें।