हजारीबाग (विकास कुमार)। झारखंड के हजारीबाग जिले का इचाक प्रखंड धनिया उत्पादन के एक बड़े केंद्र के रूप में उभरा है। यहां के धनिया की सुगंध देश की तमाम बड़ी मंडियों के साथ ही सात समुंदर पार भी पहुंच रही है। किसानों के खेत से ही धनिया बिक जा रहा है। बड़े व्यापारी इसे पटना, बनारस, कोलकाता, व मुंबई सहित देश की विभिन्न बड़ी मंडियों में भेज रहे हैं। जहां से इसे विदेश भी भेजा जा रहा है। धनिया उत्पादन से यहां के किसानों की स्थिति में सुधार हुआ है।

लगातार बढ़ रहा रकबा

केवल इचाक प्रखंड में ही 5000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में धनिया की खेती हो रही है। मुनाफा होता देख इसका दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। बड़े पैमाने पर हो रही धनिया की खेती से किसानों को अच्छी-खासी आमदनी हो रही है। यहां धनिया उत्पादन की शुरुआत 1985 में हुई थी। अब करीब पांच हजार किसान बड़े पैमाने पर धनिया की खेती कर रहे हैं। इचाक के अलावा अन्य क्षेत्रों के किसान भी धनिया का उत्पादन करने में जुट गए हैं।

कम समय में अधिक मुनाफा

किसान नरेश मेहता बताते हैं कि धनिया की खेती में कम समय में अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। 40 से 45 दिनों में धनिया के पौधे तैयार हो जाते हैं। इस वजह से किसान इसकी खेती से जुड़ रहे हैं। वर्तमान में चपरक, हदारी, चंदवारा, हथिया, अलौंजा, फुफंदी, डुमरौन, बरियठ बोंगा, खुटरा, दरिया, पोखिरया सहित अनेक गांवों में बड़े पैमाने पर धनिया की खेती की जा रही है।

उपयुक्त है मौसम

कृषि विज्ञान केंद्र, हजारीबाग के कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रशांत वर्मा के मुताबिक, इचाक प्रखंड और हजारीबाग जिला ही नहीं पूरा उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल गर्मियों में धनिया की खेती के लिए उपयुक्त है। यही कारण है कि यहां धनिया फायदे का सौदा साबित हो रही है। बेहतर तकनीक और वैज्ञानिक खेती से उपज और भी बढ़ाई जा सकती है। यहां के वातावरण के अनुरूप पंत हरीतिमा किस्म अनुशंसित है। इस खेती के लिए खर-पतवार सबसे बड़ी समस्या है।

इससे बचने के लिए पंक्तियों में खेती करनी चाहिए। प्रति लीटर 10 ग्राम यूरिया का छिड़काव भी उपज के लिए लाभदायक होता है। जैविक खेती के लिए नीम वर्गीय स्प्रे उपयुक्त है, जबकि फफूंदनाशी के रूप में ट्राइकोडर्मा का छिड़काव किया जाना चाहिए।

प्रशिक्षण से अपना सकते हैं बेहतर तकनीक

जिला कृषि पदाधिकारी, हजारीबाग अशोक सम्राट का कहना है कि उचित प्रशिक्षण और सही पद्धति अपनाकर पैदावार बढ़ाई जा सकती है। फिलहाल यहां किसानों को करीब 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिल रहा है। जबकि इसे 180 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंचाया जा सकता है। इसके लिए कृषि विज्ञान केंद्र सहित कई निजी कंपनियां भी काम कर रही हैं। 

By Sanjay Pokhriyal