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गुमला के पूर्व DC के 5 साल के प्रयास ने लाया रंग, 'मांदर ऑफ झारखंड' के नाम से रजिस्टर हुआ लोक वाद्ययंत्र

Published: Tue, 29 Sep 2026 09:03 AM (IST)

झारखंड के पारंपरिक लोक वाद्ययंत्र मांदर को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग मिल गया है, जिसे 'मांदर ऑफ झारखंड' के नाम से पंजीकृत किया गया है।

गुमला के तत्कालीन उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी राष्ट्रपति को मांदर देते हुए

गुमला के तत्कालीन उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी राष्ट्रपति को मांदर देते हुए

HighLights

  1. मांदर को 'मांदर ऑफ झारखंड' नाम से मिला जीआई टैग।

  2. गुमला के पूर्व डीसी कर्ण सत्यार्थी के प्रयासों से मिली सफलता।

  3. कारीगरों को पहचान और सांस्कृतिक विरासत को मिलेगा संरक्षण।

जागरण संवाददाता, गुमला। आदिवासी संस्कृति और झारखंडी लोकजीवन की पहचान मांदर की थाप अब देश-दुनिया में आधिकारिक पहचान के साथ गूंजेगी। झारखंड के पारंपरिक लोक वाद्ययंत्र मांदर को भौगोलिक संकेतक  टैग मिल गया है। चेन्नई स्थित भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री ने इसे  मांदर ऑफ झारखंड  के नाम से पंजीकृत किया है।

मांदर को जीआई टैग दिलाने में  गुमला के तत्कालीन उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी ने अहम भूमिका निभाई। स्थानांतरण के बाद भी उन्होंने इस प्रयास को जारी रखा और मांदर को झारखंड की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के रूप में जीआई मान्यता दिलाने की प्रक्रिया से जुड़े रहे। करीब पांच वर्षों के प्रयास, दस्तावेजी प्रमाण और प्रक्रियागत चुनौतियों के बाद यह उपलब्धि हासिल हुई है।

जनजातीय जीवन से गहरे सांस्कृतिक संबंध को प्रमाणित किया

जीआई आवेदन में मांदर की विशिष्ट बनावट, स्थानीय कच्चे माल, पारंपरिक निर्माण तकनीक, इसकी ध्वनि और झारखंड के जनजातीय जीवन से इसके गहरे सांस्कृतिक संबंध को प्रमाणित किया गया। इसके लिए 1915 से 1940 के बीच के ऐतिहासिक दस्तावेजों और विभिन्न पुस्तकों एवं अभिलेखों को भी आधार बनाया गया। 

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झारखंड में मांदर केवल वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन और लोक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। सरहुल, करमा समेत विभिन्न पर्व-त्योहारों और पारंपरिक नृत्य में मांदर की थाप लोगों को जोड़ती है। राज्य में इसके विभिन्न पारंपरिक रूप भी प्रचलित हैं। 

कारीगरों को अपनी कला की विशिष्ट पहचान स्थापित करने में मदद मिलेगी

जीआई टैग मिलने से मांदर बनाने वाले पारंपरिक कारीगरों को अपनी कला की विशिष्ट पहचान स्थापित करने में मदद मिलेगी। जीआई  व्यवस्था किसी क्षेत्र विशेष से जुड़े उत्पाद की प्रामाणिकता और विशिष्ट भौगोलिक पहचान को संरक्षण देती है। इससे पारंपरिक शिल्प को बाजार और पहचान मिलने की संभावनाएं भी बढ़ती हैं।

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मांदर के जीआई  टैग के साथ झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है। इससे पहले सोहराय-खोवर चित्रकला और  कलाकंद समेत राज्य के कई पारंपरिक उत्पादों को जीआई  पहचान मिल चुकी है।

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